Thursday, 9 January 2020

January 09, 2020

इसलाम कुबूल करने वाले नए मुसलिम की कहानी खुद उनकी ज़ुबानी

इसलाम कुबूल करने वाले नए मुसलिम की कहानी खुद उनकी ज़ुबानी

जनाब अबदुल्लाह (गंगा राम चोपड़ा जी) से एक इंटरविय new muslim interviews
new muslim interviews

जनाब अबदुल्लाह (गंगा राम चोपड़ा जी) से एक इंटरविय


इंटरविय लेने वाले के नाम : मौला अहमद औव्वाह नदवी
इंटरविय देने वाले के नाम : जनाब अबदुल्लाह साहब ( गंगा राम चोपड़ा जी)
अहमद औव्वाह    : अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि व•ब•र•कातुह
अबदुल्लाह साहब  : वलैकुमुस्सलामु वरह•मतुल्लाहि व•ब•र•कातुह

सवाल : अबदुल्लाह साहब बहुत ज़माना पहले अब्बी अपने मज़मून में जो हमारे यहाँ की उर्दू मैगज़ीन अर•मगा़न में छपा था आप के कुबूल इसलाम के वाकिआ (कहानी) का ज़िक्र (चर्चा) किया था. उसी वक्त से मुलाकात का इशतियाक़ था और दिली खाहिश थी के अर•मग़ान जो इसलाम कुबूल करने वाले खूश किसमत लोगों के इंटरवियू शेएर करने का सिल्सिला शुरू किया गया है.आप से भी एक मुलाकात हो जाए. तो खुद आप की ज़बान से बातें मालूम हों. अल्लाह ने बड़ा करम किया कि आप आ गए मैं आप का कुछ वक्त लेना चाहता हूँ और आप से कुछ बातें करना चाहता हूँ,

जवाब :   बड़ी अच्छी बात है.आप से मिल कर बड़ी खुशी हुई. हज़रत ने परिचय कराया कि यह अहमद मेरे बेटे हैं. बहुत अच्छा लगा आप की सूरत देखी दिल को लगा अल्लाह ने हज़रत को औलाद भी बहुत प्यारी दी है. असल में मैं scott hart असपताल में इलाज चल रही है. मेरा आज चेकअप का दिन था. मुझे मालूम हुआ था कि मौलाना साहब दिल्ली में मिल सकते हैं. मेरा दिल सही में चाह रहा था कि किस तरह मौलाना साहब के दरशन हो जाएं कई साल हो गए कोशिश के बाद भी नहीं मील सका. मेरे अल्लाह का एहसान है कि आज अच्छी तरह मुलाकात हो गई और कई साल की सारी कहानी सुना कर दिल बहुत खूश हुआ . मौलाना साहब भी बहुत खूश हुए. आप मेरे लाएक जो ख़िदमत हो ज़रुर बताये.

सवाल : आप पहले अपना परिचय कराये? और अपने परिवार के बारे में बताये?

जवाब : मेरा पहला नाम गंगा राम चोपड़ा था, मैं रोहतक के एक गांव में एक पढ़े लिखे ज़मीनदार घरानें में  1जनवरी 1948 को पैदा हुआ गांव के स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की फिर रोहतक Admission लिया, 1967 में बीकॉम करने के बाद एक स्कूल में पढ़ाने लगा फिर मुझे एक रिश्ते से सेल टैक्स की नौकरी मिल गई, मैं रोहतक जिला का सेल टेक्स अफसर था, चार साल पहले मैं अपनी बिमारी के कारन रिटाइरमेंट ले लिया, मेरी शादी एक बड़े घराने में हुई, मेरी बीवी मुझ से अधिक पढ़ी लिखी थी और शादी के वक्त वह जिला शिक्षा अधिकारी (B.S.A) पर कर्मचारी थी, मेरी खाव्हिश (इच्छा) थी कि मेरी बीवी घरैलू औरत बन कर आराम से रहे, मेरे लिए औरतों की नोकरी गाय को हल में जोतने की तरह ग़लत था, मैं ने शादी के तीन साल बाद जोर देकर उन से नोकरी छुड़वा दी मगर उन के मर्जी के खिलाफ यह फैसला हुआ था इस लिए हमारा परिवारिक जीवन दुखी हो गई, बात बढ़ती गई, वह अपने घर चली गई और उन के घर वाले मेरी जान के दुशमन हो गए और बात अदालत तक पहुंची मुकदमेबाजी़ चलती रही और  पारिवारिक जीवन की यह अप्रिय मेरे ससुराल वालों की मुझ से दुशमनी और मुकदमेबाजी़ मेेरे लिए मसीहा बन गई और मेरे इसलाम में आने का ज़रीआ Source हुआ.

सवाल : माशाअल्लाह अजीब बात है, आप ज़रा इस हिदायत (निर्देश) मिलने और इसलाम कुबूल करने के (कहानी) को ज़रूर बताये?
जवाब : मुकदमेबाज़ी जो़रों पर थी, अदालत का रुख मेरी बीवी की तरफ लग रहा था और खियाल था कि मुझे सज़ा और जुरमाना दोनों का सामना करना पड़ेगा मेरे वकील मुझे मशवरा (सलाह) दिया कि अगर आप कहीं से मुसलमान होने का सर्टिफिकेट प्रात करलें तो उसे अदालत में पेश कर के आप की बहुत आसानी से जान बच सकती है, मुझे किसी नुसलमान ने बताया कि माल्यरकोटला में एक मुफती साहब हैं, उनका सर्टिफिकेट सरकार मानती है, मैं वहाँ गया मुफती साहब तो नहीं मिले मगर लोगों ने बताया कि यह तो 15-20 हज़ार रूपये लेते हैं, मेरे लिये कोई बड़ी बात नहीं थी मगर मुफती साहब हैदराबाद के सफर से चार रोज़ बाद लोटने वाले थे, इतना इंतिज़ार करना मेरे लिए मुशकिल था, मैं वापस आ रहा था, रास्ता में एक मस्जिद दिखाई दी, मैं ने अपने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा और खियाल हआ कि यहाँ के मियाँ जी के मालूम करूं, क्या और कहीं भी यह  काम हो सकता है? इमाम साहब सहारनपूर के रहने वाले थे, उन्हों ने बताया कि यूपी के जिला मुज़फ्फर नगर में एक जगह फुलत है, वहाँ पर मौलाना कलीम साहब रहते हैं, आप वहाँ चले जाये और किसी से कुछ मालूम न करें और वहाँ आप का एक पैसा भी न लगेगा और सारा काम कानूनी तोर वह पर खुद पक्का करवा देंगे और उन्हों ने मुझे पूरा रास्ता लिख कर दिया-
कुछ कार्यालय व्यस्तता की वजह से मैं वहाँ जल्दी न जा सका लगभग 25 दिन के बाद मैं ने मोका निकाला 29 जनवरी 1994 को मैं फुलत पहुंचा,रमज़ान का महीना था,दिन छिपने के ज़रा बाद मैं अपने गार्ड और ड्राइवर के साथ फुलत पहुंचा,मौलाना साहब मस्जिद में एतेकाफ में थे,एक साहब मुझे मस्जिद में नौलाना साहब के पास ले गए,मस्जिद के छोटे कमरे में मौलाना साहब से मेरी मुलाकात हो गई और मैं ने साफ साफ अपने आने का इरादा बताया और मौलाना साहब से कहा कि मुझे इसलाम कुबूल करने (मुसलमान होने) का सर्टिफिकेट चाहये,अपनी बीवी के मुकदमा से बचने के लिए अदालत में जमा करना है,मुझे मुसलमाम होना नहीं है,न धर्म बदलना है और न धर्म बदल सकता हूँ,सिर्फ सर्टिफिकेट चाहये नौलाना साहब ने मुझ से कहा: क्या आप अदालत में भी यही कह कर सर्टिफिकेट जमा करेंगे, कि मैं मुसलमान नहीं हुआ हूँ बल्कि सिर्फ जाली (नकली) सर्टिफिकेट बनवाया है,मैं ने कहा: भला यह कैसे हो सकता है: अदालत में तो मैं यही कहूँगा कि मैं मुसलमान हो गया हूँ इस लिए मेरी बीवी से मेरा कोई संबंध नहीं,मौलाना साहब ने कहा: जहाँ आप बैठे हैं यह मस्जिद है, मालिक का घर है,इस की बड़ी अदालत में आप को हम को, सब को,पेश ( उपस्थित) होना है,वहाँ सब से पहले इस ईमान और इसलाम के सर्टिफिकेट के बारे में सवाल होगा और वहाँ जाली सर्टिफिकेट पर पास नहीं होगा, इस पर वहाँ की दौज़ख़ (नर्क) की जेल में सजा होगी, अच्छा यह तो आप का और आप के मालिक का मामला है?मगर मेरा कहना यह है कि आप हम से क्यों कहते हैं,कि मुझे मुसलमान नहीं होना है,आप हम से यह कहये कि मैं मुसलमान होना चाहता हूँ, मुझे मुसलमान कर लीजये और एक सर्टिफिकेट भी चाहये, हम आप को कलमा पढ़वाते हैं, दिलों का भेद तो हम नहीं जानते, हम तो यह समझ कर आप को मुसलमान कर लेंगे, कि आप सच्चे दिल से मुसलमान हो रहे हैं, इस में हमारा यह फाइदह होगा कि हमारे मालिक ने एक आदमी के ईमान का ज़रिआ (source) बनने पर हनारे लिए जन्नत (स्वर्ग ) का वादा किया है, हमारा काम हो जाएगा, जहाँ तक दिल का मामला है वह दिलों का भेद जानने वाला मालिक दिलों को फेरने वाला भी है, क्या खबर आप उस के घर में इतनी दूर से यात्रा कर के आए हैं आप को सच्चा ईमान वाला बना दें फिर आप को हम सर्टिफिकेट भी बनवा देंगे और वह हमारे नज़दीक सच्चा सर्टिफिकेट होगा, हम जाली कोई काम नहीं करते, मैं ने कहा : जी ठीक है मैं सच्चे दिल से मुसलमान होना चाहता हूँ और मुझे सर्टिफिकेट भी चाहये, मौलाना साहब ने मुझे इस्लाम के बारे में कुछ बताया और यह भी कहा कि मौत के बाद उस बड़े हाकिम और बड़ी अदालात में हम सब को पेश होना है, न झूटी गवाही चलेगी न सर्टिफिकेट, अगर आप उस मालिक के लिए सच्चे दिल से यह कलमा जो मैं आप को पढ़ा रहा हूँ, पढ़ लोगे तो मौत के बाद की हमेशा की ज़िन्दगी में आओ के लिए स्वर्ग (जन्नत) होगी, चाहे आप बहार से किसी से मुसलमान होने को भी न कहें, मौलाना साहब ने मुझे कलमा पढ़ाया और इस का हिंदी अर्थ (तर्जुमा) भी कहलवाया और मुझ से हमेशा अकेले अल्लाह की पूजा करने और उस के सच्चे रसूल की ताबेदारी (अनुसरण) का अहद भी कराया और मेरा इस्लामी नाम अब्दुल्लाह बताया-
मौलाना ने बताया कि हमारे मदरसे का दफ्तर अब बंद है आप रात को रुकें, सुबह नो बजे इंशाअल्लाह मैं आप को सर्टिफिकेट बनवा दूंगा, आप चाहें तो मस्जिद में हमारे और हमारे साथियों के साथ क़याम रुकें, यहाँ आप को अच्छे लोगों के संगति मिलेगी और चाहें तो हमारे घर बैठक में आराम करें, मैं ने मस्जिद में आराम के के लिए कहा सैंकड़ों लोग मौलाना के साथ मस्जिद में रह रहे थे, जिन में हरयाणा के काफी लोग थे इन में सोनी पथ के सब से ज्यादा थे, मैं सोनी पथ में कई साथ रह चूका था, आधी रात के बाद सब लोग उठ गए अपने मालिक के सामने रोने और इस काबड़िले में ज़िक्र करने वाले याह लोग मुझे बहुत अच्छे लगे, मैं भी उठ कर बेथ गया और मैं भी इन के साथ ''ला इलाह इल्लल्लाह'' का ज़िक्र करता रहा, दुश्मनी मुक़दमे बाज़ी और घरेलु ज़िन्दगी की इस बेचैनी में मेरी यह रात ऐसी गुज़री जैसे थक बच्चा अपनी माँ के गोद में आ गया हो, मौलाना ने मुझे सर्टिफिकेट सुबह को बनवा कर दे दिया, मैं ने फीस मालूम की तो मौलाना ने सख्ती से मना कर दिया, शांति और सुकून के इस माहौल में मेरा दिल चाहा कि कुछ और वक़्त गुजारूं, मैं ने मौलाना साहब से इजाज़त चाही के एक रात और मैं रुकना चाहता हूँ, मौलाना ने कहा : बड़ी ख़ुशी की बात है, एक रात नहीं जब तक आप का दिल चाहे आप हमारे मेहमान हैं, यहाँ गाँव में जो तकलीफ हो उस को माफ़ कर दीजये, शाम तक मौलाना अलग अलग वक़्तों में अल्लाह वालों के किस्से कुर्आन की बातें और दीन की जो बातें अपने मुरीदों को बताते रहे, मैं भी सुनता रहा और मेरा गार्ड भी साथ रहा, वह बड़ा धर्मिक आदमी है, शाम को सोनी पथ के एक साथी को ले कर खतौली गया और वहां से 25 किलो लड्डू लाया, मेरा दिल चाहा कि अल्लाह के इन सच्चे भक्तों को अपने इमान की ख़ुशी में मिठाई खिलाऊँ, रात के खाने बाद मैं ने दो साथियों से वह लड्डू बंटवाए, दिल तो अगले रोज़ भी ऐसे माहौल से जाने को न चाहता था, मगर दफ्तर की मज़बूरी और तीसरे रोज़ मेरे मोक़दमे की तारीख होने की वजह से मैं वापस आ गया, दो रात की वह शांति भरा माहौल मेरे बेचैन जीवन को सुखी और शांत कर गया, वापसी में मेरा गार्ड जिस का नाम महिंद्र था मुझ से कहने लगा : सर!जीना तो यहाँ सीखना चाहये, आप ने मौलाना साहब के भाषण (तक़रीर) सत संग सुनी? मुझे 15 साल हो गए, राधा सॉवामी सत संग में जाते हुए, जो सच्चाई, प्रेम और शांति यहाँ मिली, उस की हवा भी वहां नहीं, ऐसा लग रहा था जैसे हर बात गात (दिल) में घुस रही हो, सर! छोड़ये सब संसार!मौलाना साहब के चरणों में आ कर रहें, चैन और सुख तो बस यहाँ मिलेगा, सारे साथी भी कैसे सीधे सादे, ऐसा लग रहा रहा था कि सच्चों का संसार है, मैं ने उस से कहा तू भी कलमा पढ़ लेता, उसने कहा कि सर! जब आप को कलमा पढ़वा रहे थे तो मैं  भी आहिस्ता आहिस्ता कलमा पढ़ रहा था और दिल दिल में अपने मालिक से कह रहा था, कि मालिक!जब आप दिलों के भेद जानते हैं, तो अगर यह धर्म सच्चा है तो हमारे सर के दिल को फेर दे और मुझे भी उन के साथ करदे-
Aap ki amanat aap ki seva me

मौलाना साहब ने अपनी किताब "आप की अमानत आप की सेवा में" पाँच सेट दी थी, कि आप इसको पढ़ें और अपने साथियों को भी पढ़वाएं, मैं जा कर एक किताब अपने गार्ड महिंद्र को दी एयर खुद भी पढ़ी, अब मुझे इस्लाम के बारे में सौ प्रतिशत इत्मिनान हो गया था, इस लिए कि मैं दो रोज़ में ईमान वालों को देख चूका था, मेरे वकील ने मुझे फोन किया, मुझे सर्टिफिकेट दिखादें, मैं अगले रोज़ मिलने को कहा, मगर सुबह हुई तो मेरे दिल में आया कि मुझे इस सर्टिफिकेट को अपने मालिक की अदालत में पेश करना है, इस लिए मुझे इस अदालत में धोका के लिए नहीं पेश करना चाहये, मैं ने आप की अमानत उठाई और अपने मालिक को हाज़िर नाज़िर जान कर एक बार कलमा को इस में देख कर सच्चे दिल से दोहराया, मोक़दमे की तारीखें लगीं, फैसला मेरे बीवी के हक़ में हुआ, मुझ पर एक लाख रूपया जुर्माना और महीना खर्चा हुआ, ईद के बाद मैं सोनी पत मदरसा गया, वहां के पिरिनस्पल साहब से मिला और अपने दीं लेने की ख़ुशी में बच्चों और इस्टाफ को दावत(निमंत्रण) की और मिठाई भी बाटी, मुझे मौत से डर लगता था, एक रोज़ दफ्तर में था कि मेरे सीना दर्द शुरू हुआ और दर्द बढ़ते बढ़ते मैं बेहोश हो गया, मुझे अस्पताल लेजाया गया, डॉक्टरों ने हार्ट अटेक बताया, मैं 24 रोज़ इमर्जन्सी और I.C.U में रहा, कुछ तबियत सम्भली, चार पॉँच महीने आराम के बाद ऑफिस जाने लगा, इन चार पाँच महीनों में, मैं घर पर रहा, मुझे मौका मिला कि मैं इस्लाम को पढूँ मैं ने तलाश किया तो मौलाना साहब के भेजे हुए हमारे क़रीब में दुजाना में एक हाफ़िज़ साहब इमाम थे उन के पास जाने लगा और नमाज़ सीखी और नमाज़ पढ़ने लगा, दिल्ली से इस्लाम किया है? मरने के बाद किया होगा? वगैरा (आदि) किताब मंगा कर पढ़ा मौलाना साहब से मिलने को मेरा दिल बहुत चाहता था, एक रोज़ दुजाना के एक साहब ने बताया कि मौलाना का प्रोग्राम आज बागपत में है और मुझे मिलने जाना है, मैं ने कहा मेरे साथ चलें, मेरा दिल भी मिलने को बहुत चाह रहा है, हम लोग बागपत पहुंचे, मस्जिद में प्रोग्राम शुरू हो चूका चूका था तक़रीर के बाद मैं मौलाना साहब से मिला, मौलाना बहुत खुश भी हुए कि इतने दिनों में मुलाक़ात हुई, मुझे इतना कमज़ोर देख कर परेशां भी हुए, मैं ने बताया कि मुझे सबसे कठिन हार्ट अटैक दिल का दौरा हुआ और 25 रोज़ में इमर्जन्सी में रहा, प्रोग्राम के बाद एक साहब के यहाँ दावत थी, मेज़बान हमें भी ज़ोर देकर साथ ले गए, मौलाना ने मालूम किया कि चोपड़ा जी आप का परहेज़ चल रहा होगा, मैं ने मौलाना साहब से कहा कि हज़रत आप तो अब चोपड़ा न कहें, आप ने खुद मेरा नाम अब्दुल्लाह रखा था, मौलाना  साहब ने कहा कि अच्छा अब्दुल्लाह आप के लिए परहेज़ का इंतिज़ाम करें? मैं ने कह:मौलाना साहब आप के साथ खाऊंगा वह मुझे बीमार करने के बजाए अच्छा ही करेगा, मौलाना साहब से मैं ने बताया कि मैं ने आप की अमानत पढ़ी, असल में तो आप के साथ रह कर ही काफी हद तक मुस्लमान हो गया था, मगर आप की अमानत पढ़ने के बाद तो मुझे अंदर तक इत्मिनान हो गया और मैं ने तन्हाई में मालिक को हाज़िर नाज़िर जान कर दोबारा कलमा पढ़ा और अदालत में सर्टिफिकेट भी जमा नहीं किया और अल्लाह के शुक्र से यह हाफिज साहब जानते हैं, पाँचों वक़्त नमाज़ पढता हूँ और आप मेरी नमाज़ सुन लीजये, जब मैं नमाज़ और जनाज़े की दुआ सुनाई तो मौलाना ने मुझे खड़ा कर के चिमट गए और मेरे हाथ को ख़ुशी और प्यार से चूमा, बार बार मुबारक बाद दी और बताया कि हम और हमारे साथियों ने बहुत दिल से दुआ की थी कि मेरे मालिमक ज़बान से कहलवाने वाले हैं आप दिल में डालने वाले हैं, इन को सच्चा मुसलमान बना दीजये अल्लाह का शुक्र है मेरे मालिक ने इन गंदे हाथों की लाज रख ली-

सवाल: आप के गार्ड जिन का आप ज़िक्र कर रहे थे, महिंद्र, आप ने फिर इन के इमान की फ़िक्र नहीं की?
जवाब: अहमद साहब मैं उस की फ़िक्र कहाँ करने वाला था वह तो बहुत ऊंचा उड़ा_

सवाल: वह आज कल कहाँ है ?
जवाब: वह तो जन्नत में है

सवाल: वह किस तरह? ज़रा सुनाये?
जवाब: मैं बताया ना कि वह बहुत धार्मिक (मज़हबी) आदमी था वह जाट फैमली से तअल्लुक़ रखता था, फुलत से आ कर तो बस इस आग से लग गईं, उस ने आप की अमानत पढ़ी, तो पढ़ कर मेरे पास आया और कहने लगा सर! आप ने वह किताब पढ़ी? मैं ने कहा कि अभी नहीं पढ़ी, उस ने कहा कि सर आप ने बड़ी नाक़दरी की, दो रोज़ सोवर्ग में रह भी आप को वहां का मज़ा ना लगा, सर आप वह किताब ज़रूर पढ़ें, मैं अब सच्चा मुस्लमान हूँ, मैं अपना नाम मोहम्मद कलीम रखा है, सर आप तो अब मुझे मोहम्मद कलीम ही कहा करें, उस के बाद उस को दीं सीखने का शोक लग गया, रोहतक में चौराहे पर एक मस्जिद है इस लाल मस्जिद कहते हैं, कहते हैं, यह बड़ी इतिहासिक मस्जिद है, यहाँ बहुत बड़ा पीर और मौलाना साहब रहते थे, जिन्हों ने पूरे हिंदुस्तान में दीन फैलाया, इन का नाम ही वालीअल्लाह था, वह इस मस्जिद के इमाम के पास रोज़ जाता था और फिर चार महीने की छुट्टी ले कर जमाअत में चला गया, दाढ़ी रख कर आया, एक दिन मैं किसी काम से दिल्ली गया था, वह मुझ से जुमा की नमाज़ पढ़ने की इजाज़त ले कर गया, दफ्तर से वज़ू कर के गया, सड़क पर कर रहा था कि एक मोटरसाइकल वाले ने टक्कर मार दी, सर के बल गिरा और सर में चोट आई, बेहोश हो गया, ड्राइवर ने मुझे बताया, हम उसे अस्पताल ले कर गए, आठ रोज़ तक पंथ में रहा मगर होश नहीं आया, घर वाले इलाज करते रहे, 15 रोज़ के बाद मैं उस को अस्पताल में देखने गया, वह बेष था अचानक उस के पाँव हिले, मैं ने आवाज़ दी, उस ने आँख खोल दी, मुझे इशारा से क़रीब किया और आहिस्ता से बोला, सर मेरा सर्टिफिकेट क़ुबूल हो गया, ज़ोर से एक बार कलमा पढ़ा और चुप हो गया, वह मुझ से बहुत आगे निकल गया, वाक़ई बहुत सच्चा आदमी था_

सवाल: अब वह कहाँ है?
जवाब: अहमद भाई मैं यही तो कह रहा हूँ, फिर वह हमेशा के लिए चुप हो गया, वहां उस की यह ज़बान चुप हो गई, मगर वह हमेशा मेरे कान में कहता है, सर मेरा सर्टिफिकेट क़ुबूल हो गया, '' लाइलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह'' उस दिन से मैं रोज़ अपने अल्लाह से दुआ करता हूँ ए अल्लाह! आपने एक सच्चे का सर्टिफिकेट तो क़ुबूल कर लिया, इस सच्चे के सदके में बल्कि अपने रसूल के सदके में मुझ फ़्रोड जाली सर्टिफिकेट भी क़ुबूल कर लीजये

सवाल: आप की बीवी कहाँ हैं? आप के कोई बच्चे भी है? इस बारे में आप ने नहीं बताया-
जवाब: मैं खुद ही आप को इन के बारे में बताने वाला था, हुआ यह कि पाँच वक़्त की नमाज़ के साथ मैं ने एक ज़माना से तहज्जुद पढ़नी शुरू की थी, फुलत में इस आधी रात की इबादत में, मैं ने बड़ा मज़ा देखा, एक रात मैं ने अपनी बीवी को सपना में देखा, एक कटहरे में बंद हैं और मुझ से फर्याद कर रही हैं, मैं जैसी भी हुई हूँ, आप मुझे इस कटहरे से निकल दें, मेरे घर वालों ने मुझे कितना कहा, कि दुसरे से शादी करले मगर मैं ने कभी गवारा नहीं किया, जब मैं आप की हूँ तो आप के इलावा मुझे कोण इस कटहरे से निकलेगा और बहुत रो रही है मुझे तरस आ गया, मैं ने देखा, बड़ा ताला लगा हुआ है, चाभी मेरे पास नहीं है, मैं बहुत परेशान हुआ कि इस टाला को कैसे खोला जाए, अचानक मेरा गार्ड कलीम (महिंद्र) आ गया और जेभ से चाभी निकल कर बोला, सर! यह '' लाइला ह इल्लल्लाह '' की चाभी है आप अपने मेडम को क्यों नहीं निकलते? मेरी आँख खुल गई, सुबह तीन बजे थे, मैं ने वज़ू किया नमाज़ पढ़ी, मुझे ख्याल आया कि इस औरत ने सारी जवानी मेरे लिए गवां दी,यहां तक ​​कि खर्च भी मुझ से लिया, मइके वालों के यहाँ रहना भी गवारा न किया मुझे बहुत याद आई, अकेले रहते रहते मुझे भी तंग आ गया था, टूटे हुए दिल से मैं ने अपने बेकस हाथ अल्लाह के आगे फैला दिए, मेरे मौला! मेरे करीम! मेरे रब मैं ने अब सारे झूठे खुदाओं को छोड़ कर आप की बंदगी का अहद किया है, और कोण सा दर है, जो मेरा सवाल पूरा करेगा? मेरे अल्लाह जब उस ने मेरी रह कर सारी जवानी गवां दी, तो फिर आप उस को मेरे पास भेज दीजये, आप के लिए कुछ मुश्किल नहीं जब आप एक गंगा राम और महिंद्र का दिल फेर कर अब्दुल्लाह और कलीम बना सकते हैं, तो आप एक सुरेता देवी को फातिमा या आमिना बना कर मेरी मुस्लमान बीवी क्यों नहीं बना सकते, मैं ने बहुत दुआ की और मेरा रुंवा रुंवा मेरे साथ दुआ में शामिल था, मेरे ख्वाब की वजह से मुझ पर तौहीद की एक अजीब कैफियत तारी थी-
सवाल: फिर किया हुआ?
जवाब: एक गंदे भिकारी बंदा ने करीम का दरवाज़ा खट खटाया, यह कैसे मुमकिन था कि दरवाज़ा न खुलता, दो रोज़ गुज़रे थे, तीसरे रोज़ में अपने घर में, दोपहर को बैठा था, घंटी बजी, मैं ने नौकर से दरवाज़ा खोलने और देखने के लिए कहा, मेरी आँख हैरत से फटी की वहति रह गई, जब मैं ने देखा कि बजाए इस के कि नौकर आकार मुझे बताता कि फलां साहब आए हैं, दोनों बच्चों के साथ सुरेता मेरे सामने थी, वह आ कर मुझ से चिमट गई दस साल बाद मैं ने उस को देखा था वह जवानी खो चुकी थी, बिल्क बिल्क कर देर तक रोती रही, बीटा बेटी जो अब बड़े हो गए थे, वह भी रोने लगे, कहने लगी जब आप ने मेरे सात फेरे फिर हैं, तो मेरी इज़्ज़त मेरा दिल आप के इलावा कोण रखेगा, मैं ने उस को तसल्ली दी और मेरे दिल में चूंके यह बात थी, कि मेरे अल्लाह ने मेरे गंदे हांथों को यह भीक दी है, इस लिए यह आई है मगर मैं ने फिर भी उस से कहा कि अब बात हाथों से निकल गई है उस ने पूछा क्यों, मैं ने कहा मैं अब मुस्लमान हो गया हूँ उस ने कहा मैं नर्क में भी आप के साथ रहूँ गी, मैं ने उस कलमा पढ़ने को कहा वह फ़ौरन तैयार हो गई, मैं ने कलमा पढ़वाया और उस का नाम आमिना रखा, बच्चों का नाम हसन और फातिमा रखा, असल में हुआ यह कि वह अपने मइके में अलग कमरा में रहती थी, बच्चों की लड़ाई में उस की भाभी के साथ उस की लड़ाई हो गई, उस ने बहुत बुरा भला कहा और यह भी कहा कि अगर तू किसी लायक होती तो पति के दर क्यों छोड़ती, अगर असल की होती तो पति के साथ हो जाती, जिसे पति ने धुत्कार दिया वह औरत किया डाइन है, बस उस के दिल को लग गई यह तो बहाना हो गया वर्ण मेरे रब को मुझे भीक देनी थी, अल्हम्दु लिल्लाह डेढ़ साल से वह मेरे साथ है, हम ख़ुशी ख़ुशी इस्लामी ज़िन्दगी जी रहे हैं-
सवाल: अब्दुल्लाह साहब, वाक़ई यह कुबूलियत दुआ का अजीब वाकिया है, आप को कैसा लगा?
जवाब: अहमद भाई इस वाकिया के बाद मेरा मेरे अल्लाह के साथ एक दूसरा ही रिश्ता पैदा हो गया, मेरा अब यह हाल है कि मुझे ऐसा यकीन है कि अगर मैं अपने अल्लाह से आज ज़िद करूँ कि आज सूरज पच्छिम से निकालिये तो मेरे अल्लाह ज़रूर पूरा करेंगे-

सवाल: आप बड़े खुश किस्मत हैं, पाठकों को कुछ संदेश देना चाहेंगे?
जवाब: मेरी आप से और सभी दरखास्त है कि मेरे लिए इस की दुआ करें कि अल्लाह मेरा इमान सजदा के हालात में खात्मा फरमाएँ, मैं ने अपनी बीवी को वह सर्टिफिकेट दे दिया है, कि मैं मर जाऊं, वह मेरी क़बर में मेरे कफ़न के साथ सर्टिफिकेट राखह दें और दुआ करें कि अल्लाह तआला इस का यह जाली सर्टिफिकेट क़ुबूल कर ले बल्कि मेरे लिए क्या सारी दुनिया के लिए भी मेरी यह दुआ है और सब से दुआ की दरखास्त है कि अल्लाह तआला सब को इमान के साथ मौत अता फरमाए-
सवाल: आमीन! बहुत बहुत शुक्रिया, अब्दुल्लाह साहब आप को जल्दी भी है, अब्बी बता रहे थे कि डॉक्टर साहब से वक़्त लिया हुआ है, माफ़ किजये आप की बातें ऐसी दिलचस्प थीं, दिल चाहता था कि कुछ और बातें करूँ, बाकी इंशाअल्लाह किसी दूसरी मुलाक़ात में-
जवाब: बहुत बहुत शुक्रिया, फीअमणिल्लाह

Wednesday, 25 December 2019

December 25, 2019

क़ौम से झूट (Lie to the nation)


क़ौम से झूट

 to the nation
Interesting article

एक दिन इब्न कीम एक दरख़्त (पेड़) के नीचे बैठे हुए तब कि उन्हों ने एक चींटी को देखा जो एक टिड्डी के पंख के पास आया और उस को उठा कर ले जाने की कोशिश की मगर नहीं ले जा सका, कई बार कोशिश करने बाद अपने केम्प की तरफ दौड़ा थोड़ी ही देर में वहाँ से चींटियों की एक फ़ौज ले कर नमूदार हुआ और उन को ले कर इस जगह आ गया जहाँ पंख मिला था, गोया वह उन को ले कर पंख ले जाना चाहता था, चींटियों के इस जगह पहुँचने से पहले इब्न कीम ने वह पंख उठा लिया तो उन सब ने वहां इस पंख को ढूंडा मगर न मिलने पर सब वापस चले गए-
Lie to the nation
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मगर एक चुंटी वहीं रहा और ढूंढने लगा जो शायद वही चोंटी थी, इस बीच इब्न कीम ने वह पर दोबारा उसी जगह राखह लिया जबकि इस चींटी को दोबारा वही पंख मिल गया तो वह एक बार फिर दौड़ कर अपने केम्प में चला गया और पहले के मुक़ाब्ले में ज्यादा देर के बाद पहले के मुक़ाब्ले में कुछ कम चींटियों को ले कर आया गोया ज्यादा तर ने इस की बात को यकीन नहीं किया- इस बार भी जब वह उन को ले कर इस जगह के क़रीब पहुंची तो अल्लामा ने वह पंख फिर उठा लिया और सब ने दोबारा काफी देर तक तलाश किया मगर न मिलने पर सब वापस चले गए और हस्बे साबिक़ (पूर्व में) एक ही चींटी वहां इस पंख को ढूंढती रही, इस दौरान अल्लामा ने एक बार फिर वही पंख उसी जगह राखह लिया तो वही चींटी ने इस को ढून्ढ लिया और अपने केम्प की तरफ एक बार फिर दौड़ कर गई मगर इस बार काफी देर के बाद सिर्फ सात चींटियों को ले कर आया तब इब्न कीम ने इस पंख को फिर उठा लिया और चूंटियों ने काफी देर तक पंख को ढूंडा और न मिलने पर गुस्से से उसी चुंटी पर हमला कर दिया और उस को टुकड़े टुकड़े कर के राखह दिया गोया वह झूट बोलने पर उससे नाराज़ हो गए थे तब इब्न कीम ने वह पंख इन चींटियों के बीच राखह रख दिया जैसे ही उन को पंख मिला सारे फिर इस मुर्दा चींटी के पास जमा हो गए गोया वह सब अफ़सुर्दा और शर्मिंदा थे कि उन्हों ने इस बेगुनाह को क़त्ल किया-
इब्न कीम कहता है कि यह सब देख कर मुझे बहुत अफ़सोस हुआ और मैं ने जा कर यह वाकिया अबुल अब्बास इब्न तीमयह को बताया- उसने कहा अल्लाह तुझे माफ़ करे ऐसा क्यों किया दोबारा ऐसा मत करें-
सुब्हानअल्लाह झूट से नफरत फितरत का हिस्सा है कीड़े मकोड़े भी झूट से नफरत करते हैं और क़ौम () से झूट बोलने पर सज़ाए मौत देते हैं!
क्या यह कीड़े मकोड़े हुक्मरानों (शासन करनेवालों) से अच्छे नहीं जो दिन रात क़ौम से झूट बोलते हैं क़ौम को धोका देते हैं!
इब्न क़ीम ने अपनी किताब"مفتاح دار السعادۃ" में इस वाक्य का ज़िक्र किया है---

Thursday, 19 December 2019

December 19, 2019

जब न्याय न रहे (When justice is over)

तोते के साथ जज का गलत फैसला

जब न्याय न रहे

कहते हैं कि एक तोता तोती का गुज़र एक वीराने से हुआ, वीरानी देख कर तोती ने तोते से पूछा ''किस कदर वीरान गाँव है ,,,,?
''तोते ने कहा लगता है यहाँ किसी उल्लू का गुज़र हुआ है जिस वक़्त तोता तोती बातें कर रहे थे अचानक उस वक़्त एक उल्लू भी वहां से गुज़र रहा था, उस ने तोते बात सुनी और वहां रुक कर इन से मुख़ातब (संबोधित) हो कर बोला, तुम लोग इस गाँव में मुसाफिर लगते हो, आज रात तुम लोग मेरे मेहमान बन जाओ, मेरे साथ खाना खाओ, उल्लू की मोहब्बत भरी दावत से तोते का जोड़ा इंकार न कर सका और उन्हों ने उल्लू की दावत क़ुबूल कर ली, खाना खा कर जब उन्हों ने रुखसत होने की इजाज़त चाही ..
तो उल्लू ने तोती का हाथ पकड़ कर कहा ..
तुम कहाँ जा रही हो
तोती परेशान हो कर बोली यह कोई पूछने की बात है, मैं अपने खाविंद (पति) के साथ वापस जा रही हूँ---, उल्लू यह सुन कर हँसा और कहा.. यह तुम किया कह रही हो तुम तो मेरी बीवी हो. इस पे तोता तोती उल्लू पर झपट पड़े और गरमा गरमी शुरू हो गई, दोनो में बहस व तकरार (चर्चा) ज्यादा बढ़ी तो उल्लू ने तोते के सामने एक तजवीज़ (सुझाव) पेश करते हुए कहा
''ऐसा करते हैं हम तीनो अदालत चलते हैं और अपना मुक़दमा क़ाज़ी के सामने पेश करते हैं, क़ाज़ी जो फैसला करे वह हमें क़ुबूल होगा''
उल्लू की तजवीज़ पर तोता और तोती मान गए और तीनों क़ाज़ी की अदालत में पेश हुए, क़ाज़ी ने दलाइल (सुबूत) के रौशनी में उल्लू के हक़ में फैसला दे कर अदालत बर्खास्त करदी, तोता इस बे इंसाफी पर रोता हुआ चल दिया तो उल्लू ने उसे आवाज़ दी,
''भाई अकेले कहाँ जाते हो अपनी बीवी को साथ लेते जाओ, तोते ने हैरानी से उल्लू की तरफ देखा और बोला ''अब कियौं मेरे ज़ख्मों पर नमक छिड़कते हो, यह अब मेरे बीवी कहाँ है , अदालत ने तो उसे तुम्हारी बीवी क़रार दे दिया है'' उल्लू ने तोते की बात सुन कर नरमी से बोला, नहीं दोस्त तोती मेरी नहीं तुम्हारी ही बीवी है- मई तुम्हें सिर्फ यह बताना चाहता था कि बस्तियाँ उल्लू वीरान नहीं करते. बस्तियाँ तब वीरान होती हैं जब इन से इंसाफ उठ जाता है?

Monday, 16 December 2019

December 16, 2019

Animal justice जानवर का इंसाफ

जानवर का इंसाफ
एक जज ने अपनी कहानी सुनाई :

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मैं एक जगह सत्र (Sessions) जज लगा हुआ था. एक केस आया, एक मुल्ज़िम (आरोपी) मेरे सामने पेश किया गया जिस पर क़तल (हत्या) का इलज़ाम (दोष) था, सारे सुबूत इस के खिलाफ थे. मगर वह था बहुत मासूम शकल, और रोता और चींख्ता भी था कि मैं ने यह कतल नहीं किया. इस की मासूमियत से यह पता चलता था कि इस ने कतल नहीं किया लेकिन सुबूत यह बताते थे कि उस ने क़तल किया है.
मेरी जीवन का तजुर्बा (अनुभव) था, मेरे तजुर्बात और उस की मासूमियत यह बताती थी कि उस ने क़तल नहीं किया. इस लिए मेरी कोशिश यह शुरू हो गई कि उस को बचा लूँ. इसी कोशिश में लगभग तीन महीने मैं ने इस फैसले को लम्बा किया लेकिन मेरी कोशिश नाकाम (विफल) रही. मैं सारा दिन इसी के बारे में सोचता रहता था. मेरी जीवन का कोई यह अजीब फैसला था. अंत में मैं ने उस को सज़ाए मौत लिख दी.
दूसरे दिन उस को सज़ए मौत होनी थी मैं उस के पास गया और पूछा कि सच सच बताओ तुम ने क़तल किया है?
कहने लगा, जज साहब मैं सच कहता हूँ कि मैं ने कतल नहीं किया.
मैं ने कहा, तुम ने कौन सा ऐसा जुर्म (अपराध) किया है जिस की तुम्हें यह सज़ा मिल रही है?
कुछ देर सोचने के बाद कहने लगा, साहब जी मैं ने एक गुनाह किया है, मुझे याद आ गया है, वह ये कि मैं ने एक कुतिया को बड़ी बे दर्दी से मारा था और वह मर गई थी, बस वह क़तल मैं ने किया है.
मैं तुरंत चौंक पड़ा, और उसे कहा, तभी तो जब से तुम्हारा केस मेरे पास आया है, आज तीन महीने हो गए हैं, रोजाना जब मैं घर जाता हूँ तो एक कुतिया मेरे दरवाज़े पर बैठी होती है, और चियाओं चियाओं करती है और अपनी भषा में मुछ से इंसाफ के लिए कहती. "
जज साहब ने बताया कि दूसरे दिन उस आदमी को फाँसी हो गई और मुझे सबक़ मिला, वह यह कि अल्लाह की मखलूक़ (जीव‌‍‌) पर जुल्म करने वाले को अल्लाह ज़रूर सज़ा देता है, उस के घर में देर है अंधेर नहीं. हमारी नज़र में जो जीव हक़ीर (तुच्छ) और नजिस है लेकिन बनाने वाले को वह मखलूक़ कितनी प्यारी है...

Monday, 25 November 2019

November 25, 2019

नौरवे में कुर्आन जलाने पर उमर इलयास के जज़बात

*काफिर है तो शमशीर पे करता है भरोसा*

*मोमिन है तो बेतेग़ भी लड़ता है सिपाही!!*

Norway mein Qur'an jalane par umar ilyas ke jazbat


मर्द मुजाहिद ग़ाज़ी उमर इलयास जिसने "नार्वे" में एक ईसाई द्वारा हज़ारों लोगों के सामने "क़ुरआन" जलाने की कोशिश करने पर मलऊन ईसाई पर ह़मला कर दिया.."नार्वे" पुलिस ने इलयास को गिरफ्तार कर लिया है..


 विडियो में उस मर्द मुजाहिद इलियास गाज़ी ए इस्लाम को देख सकते हैं , जो नार्वे में क़ुरान पाक की बेहुरमती करने वाले इंसान पर बिना अपनी जान की परवाह किए बिना हमलवार हो गया 

और पूरी दुनिया को ये पैगाम दिया कि मुस्लिम कितना भी कमजोर क्यों न हो लेकिन वो क़ुरआन पाक  इस्लाम की शान में गुस्ताख़ी किसी भी हाल में बर्दास्त नहीं कर सकता, साथ ही गाज़ी इस्लाम ने रसूलअल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सच्चा उम्मती होने का सबूत पूरी दुनिया को दिया,

 अभिव्यक्ति की आज़ादी  फ़्री स्पीच जैसे शब्द गढ़कर जो इस्लाम और मुसलमानों की बेइज़्ज़ती की जाती है,

यह दोगलापन है दुनियाँ के ठेकेदारों का जो अमन की बात करते हैं भाईचारे की बात करते हैं एकता और बराबरी की बात करते हैं लेकिन जैसे ही मुसलमान और इस्लाम का नाम आता है लोगों के अंदर सोए हुए कीड़े जाग जाते हैं और इस्लाम मुस्लिम दुश्मनी में अंधे होकर उल जलूल हरकतें करने लगते हैं फिर जब उसका रिएक्शन कोई मुस्लिम की तरफ से होता है तो उसे आतंकवादी दहशत गर्द अमन का दुश्मन इंसानियत का दुश्मन अजीब अजीब ताने देकर बदनाम किया जाता है।

*मुस्लिम शिद्दत पसन्द नहि*

*बल्क़े हक़ पसन्द होते हैं*

*एक्शन का रीएक्शन*

Tuesday, 4 June 2019

June 04, 2019

ईदैन यानी दोनों ईद की नमाज़ का बयान

ईदैन यानी दोनों ईद की नमाज़ का बयान
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मसअलह 1
शव्वाल के महीने की पहली तारीख को (ईदु उल फ़ित्र) कहते हैं और ज़िलअलहिज्जा यानी बक़रईद के दसवीं तारीख को (ईदु उल अज़ह़ा)- यह दोनों दिन इसलाम में ईद और खुशी के दिन हैं- इन दोनों दिनों में दो दो रिकअत नमाज़ बत़ोर शुक्रिया के पढ़ना वाजिब है, जुमा की नमाज़ में खुतबा फ़र्ज और शर्त है और नमाज़ से पहले पढ़ा जाता है और ईदैन की नमाज़ में शर्त यानी फ़र्ज़ नहीं सुन्नत है और पीछे पढ़ा जाता है मगर ईदैन के खुतबे को सुनना भी मिष्ल जुमा के खुतबे के वाजिब है, यानी उस वक्त बोलना चालना नमाज़ पढ़ना सब हराम है ईद उल फ़ित्र के दिन तेरह (13) चीज़ेें मसनून यानी सुन्नत है- (1) शर्अ के मुवाफिक अपनी आराइश (सजावट) करना (2) ग़ुसुल करना (3) मिसवाक करना (4) अच्छे से अच्छे कपड़े जो पास मौजूद हों पहनना (5) खुशबू लगाना (6) सुबह को बहुत सवेरे उठना (7) ईदगाह में बहुत सवेरे जाना (8) ईदगाह जाने से पहले कोई शीरीं (मीठी) चीज़ मिस्ल छोहारे वगैरह खाना (9) ईदगाह जाने से पहले सदक़ा फ़ित्र दे देना (10) ईद की नमाज़ ईदगाह में जाकर पढ़ना यानी शहर की मसजिद में बिला उज्र (बिना बहाना) न पढ़ना (11) जिस रास्ते से जाए उस उस के सिवा दूसरे रास्ते से वापस आना (12) प्यादा पा यानी पैदल जाना (13) और रास्ते में اَللّٰہُ اَکْبَرْ اَللّٰہُ اَکْبَرْ لَآاِلٰہَ اِلَّااللّٰہُ وَاللّٰہُ اَکْبَرْ اَللّٰہُ       اَکْبَرْ وَلِللّٰہِ الْحَمْدُ ( अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर ला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर व लिल्लाहि अल हम्द) आहिस्ता आवाज़ से पढ़ते हुए जाना चाहिए-

ईदु उल फ़ित्र और ईदु अल अज़ह़ा की नमाज़ पढ़ने का तरीका
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मसअलह 2
ईदु उल फ़ित्र की नमाज़ पढ़ने का तरीका यह है कि नियत करे कि (दो रिकअत वाजिब नमाज़ ईद की छः वाजिब तकबीरों के साथ) अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बांध ले और सना पढ़े (सुबहा नकल्ललाहु म्मा व बिह़मदि क व तबा रकसमु क व तआला जद्दु क वला इला ह गैरु क) पढ़े फिर तीन तकबीर अल्लाहु अकबर कहते हुए दो मरतबा हाथ उठाए और तीसरी तकबीर में हाथ बांधले फिर इमाम सूरह फ़ातिहा और कोई सूरह मिला कर रुकू सजदह करेगा फिर दूसरी रिकअत के लिए खड़ा होने के बाद इमाम सूरह फ़ातिहा और कोई मिलाने के बाद चार तकबीर रुकू में जाने से पहले तीन मरतबा अल्लाहु अकबर कह कर हाथ उठाए और छोड़ दे चौथी तकबीर में बिना हाथ उठाए रुकू में चला जाए और इमाम के पीछे नमाज़ पूरी करे
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मसअलह 3
(ईदु उल अज़ह़ा) की नमाज़ का भी यही तरीका है और इस में भी वह सब चीज़ें सुन्नत हैं जो (ईदु उल फ़ित्र) में हैं, फ़र्क बस इतना है कि (ईदु उल अज़ह़ा) की नियत में बजाए ईदु अल फ़ित्र के (ईदु उल अज़ह़ा) का शब्द कहे- ईदु अल फ़ित्र में ईद गाह जाने से पहले कोई चीज़ खाना मसनून (सुन्नत) है यहाँ नहीं- और ईदु उल फ़ित्र में रास्ते में चलते वक्त आहिस्ता तकबीर कहना सुन्नत है और यहाँ ज़ोर आवाज़ से- और ईदु अल फ़ित्र की नमाज़ देर कर के पढ़ना मसनून (सुन्नत) है और ईदु अल अज़ह़ा के सवेरे- और यहाँ सदक ए फ़ित्र नहीं बल्कि बाद में कुरबानी है अहले वुसअत पर, और आज़ान व अक़ामत न यहाँ है न वहां-

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Wednesday, 22 May 2019

May 22, 2019

कज़ा रोज़े का बयान

कज़ा रोज़े का बयान

कज़ा रोज़े का बयान, qaza roze ka bayan,
qaza roze ka bayan

मसअलह 1
जो रोज़े किसी वजह से जाते रहे यानी कज़ा हो गए हों. रमज़ान के बाद जहाँ तक जल्दी हो सके उनकी कज़ा रख ले देर न करे बेवजह कज़ा रखने में देर लगाना गुनाह है-
मसअलह 2
रोज़े की कज़ा में दिन तारीख़ मोकर्रर कर के कज़ा की नियत करना कि फ़लाँ तारीख के रोज़े की कज़ा रखता हूँ यह ज़रूरी नहीं है बल्कि जितने रोज़े कज़ा हों उतने ही रोज़े रख लेना चाहिए- अलबत्ता अगर दो रमज़ान के कुछ कुछ रोज़े कज़ा हो गए इस लिए दोनों साल के रोज़ों की कज़ा रखना है तो साल का मोकर्रर करना ज़रूरी है यानी इस तरह नियत करे कि फ़लाँ साल के रोज़ों की कज़ा रखता हूँ-
मसअलह 3
कज़ा रोज़े में रात से नियत करना ज़रूरी है अगर सुबह हो जाने के बाद नियत की तो कज़ा सही नहीं हुई बल्कि वह रोज़ा नफ़ल हो गया कज़ा रोज़ा फिर से रखे-
मसअलह 4
कफ़्फ़ारे के रोज़े का भी यही हुक्म है कि रात से नियत करना चाहिए अगर सुबह होने के बाद नियत की तो कफ़्फ़ारह का रोज़ा सही नहीं हुआ-
मसअलह 5
जितने रोज़े कज़ा हो गए हैं चाहे सब को एक दम से रख लेवे चाहे थोड़े थोड़े कर के रखे दोनों बातें दुरुस्त हैं-
मसअलह 6
अगर रमज़ान के रोज़े अभी कज़ा नहीं रखे और दूसरा रमज़ान आ गया तो ख़ैर अब रमज़ान के अदा रोज़े रखे और ईद के बाद कज़ा रखे लेकिन इतनी देर करना बुरी बात है-
मसअलह 7
रमज़ान के महीने में दिन को बेहोश हो गया और एक दिन से ज़्यादा बेहोश रहा तो बेहोश होने के दिन के अलावा जितने दिन बेहोश रहा उतने दिनों की कज़ा रखे- जिस दिन बेहोश हुआ उस एक दिन की कज़ा वाजिब नहीं है क्योंकि उस दिन का रोज़ा ब वजह (कोई वजह नहीं) नियत के दुरुस्त हो गया- हाँ अगर उस दिन रोज़ा से न था या उस दिन ह़लक में कोई दवा डाली गई और वह ह़लक से उतर गई तो उस दिन की कज़ा भी वाजिब है-
मसअलह 8
और अगर रात को बेहोश हुआ हो तब भी जिस रात को बेहोश हुआ उस एक दिन की कज़ा वाजिब नहीं है बाक़ी और जितने दिन बेहोश रहा सब की कज़ा वाजिब है हाँ अगर उस रात को सुबह का रोज़ा रखने की नियत न थी या सुबह को कोई दवा ह़लक में डाली गई तो उस दिन का रोज़ा भी कज़ा रखे-
मसअलह 9
अगर सारे रमज़ान भर बेहोश रहे तब भी कज़ा रखना चाहिए यह न समझे कि सब रोज़े माफ हो गए- अलबत्ता अगर जुनून (पागल) हो गया और पूरे रमज़ान भर सड़न दिवाना रहा तो इस रमज़ान के किसी रोज़े की कज़ा वाजिब नहीं और अगर रमज़ान शरीफ के महीने में किसी दिन जुनून (पागल पन) जाता रहा और अकल ठिकाने हो गया तो अब से रोज़े रखने शुरू करे और जितने रोज़े जुनून में गए उन की कज़ा भी रखे-

नोट = कफ़्फ़ारह का मतलब है कि रमज़ान शरीफ के रोज़े जान बूझ कर तोड़ डालने पर लगातार दो महीने रोज़े रखे थोड़े थोड़े कर के रोज़े रखने से दुरुस्त नहीं या साठ 60 फ़कीर को खाना खिलाए
दूसरा कफ़्फ़ारह क़सम खाने का है अगर किसी ने क़सम तोड़ दिया यानी क़सम को पूरा न किया तो उस के लिए कफ़्फ़ारह है दस मुहताजों (फ़कीर) को दो वक्त खाना खिला दे
कफ़्फ़ारह के बारे में इंशाअल्लाह फिर कभी दूसरे पोस्ट में पूरे तफ़सील (विवरण) से बताऊँगा

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Saturday, 18 May 2019

May 18, 2019

जिन वजहों (कारण) से रोज़ा तोड़ देना जायज़ है उन के बारे में ज़रूरी बातें

जिन वजहों (कारण) से रोज़ा तोड़ देना जायज़ है उन के बारे में ज़रूरी बातें

मसअलह 1
अचानक ऐसी बीमार पड़ गई कि अगर रोज़ा न तोड़ेगा तो जान पर बन आएगा या बीमारी बहुत बढ़ जाएगी तो रोज़ा तोड़ देना दुरुस्त है जैसे दफअतन (किसी दफा) पेट में ऐसा दर्द उठा कि बेताब हो गया या साँप ने काट खाया तो दवा पी लेना और रोज़ा तोड़ देना दुरुस्त है ऐसे ही अगर ऐसी प्यास लगा कि हलाकत का डर है तो भी रोज़ा तोड़ डालना दुरुस्त है-
मसअलह 2
हामला (गर्भवती Pregnant) औरत को कोई ऐसी बात पेश आ गई जिस से अपनी जान का या बच्चा की जान का डर है तो रोज़ा तोड़ डालना दुरुस्त है-
मसअलह 3
खाना पकाने की वजह से बेहद प्यास लग आई और इतनी बेताबी हो गई कि अब जान का खौफ (डर) है तो रोज़ा तोड़ देना दुरुस्त है- लेकिन अगर खुद उसने क़सदण (इरादा) से इतना काम किया जिस से ऐसी हालत हो गई तो गुनहगार होगी-

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Thursday, 16 May 2019

May 16, 2019

सेहरी खाने और इफ़तार करने की ज़रूरी बातें

सेहरी खाने और इफ़तार करने का बयान

मसअलह 1
सेहरी खाना सुन्नत है अगर भूक न हो और खाना न खाए तो कम से कम दो तीन छोहारे ही खाले - या कोई और चीज़ थोड़ी बहुत खाले कुछ न सही तो थोड़ा सा पानी ही पी लेवे-
मसअलह 2
अगर किसी ने सेहरी न खाई और उठ कर एक आध पान खा लिया तो भी सेहरी खाने का सवाब मिल गया -
मसअलह 3
सेहरी में जहाँ तक हो सके देर कर के खाना बेहतर है लेकिन इतनी देर न करे कि सुबह होने लगे और रोज़ा में शुबह (शक) पड़ जाए -
मसअलह 4
अगर सेहरी बड़ी जल्दी खाली मगर इसके बाद पान तम्बाकू चाय पानी देर तक खाता पीता रहा जब सुबह होने थोड़ी देर रह गई तब कुल्ली कर डाला तब भी देर करके खाने का सवाब मिल गया और इस का हुक्म भी वही है जो देर करके खाने का हुक्म है-
मसअलह 5
अगर रात को सेहरी खाने के लिए आँख न खुली सब के सब सो गए तो बेसेहरी खाए सुबह का रोज़ा रखो सेहरी छूट जाने से रोज़ा छोड़ देना बड़ी कम हिम्मती की बात और बड़ा गुनाह है-
मसअलह 6
किसी आँख देर में खुली और यह ख्याल हुआ कि अभी रात बाक़ी है इस गुमान पर सेहरी खाली फिर मालूम हुआ कि सुबह हो जाने के बाद सेहरी खाई खी तो रोज़ा नहीं हुआ कज़ा रखे और कफ़्फ़ारह वाजिब नहीं लेकिन फिर भी कुछ खाए पिये नहीं रोज़ादारों की तरह रहे - इसी तरह सूरज डूबने के गुमान से रोज़ा खोल लिया फिर मालूम हुआ कि सूरज नहीं डूबा तो रोज़ा जाता रहा इस की कज़ा करे कफ़्फ़ारह वाजिब नहीं जब तक सूरज न डूब जाए कुछ खाना पीना दुरुस्त नहीं-
मसअलह 7
अगर इतनी देर हो गई कि सुबह हो जाने का शुबह (शक) पड़ गया तो अब कुछ खाना मकरूह है और अगर ऐसे वक्त कुछ खा लिया या पानी पी लिया तो बुरा किया और गुनाह हुआ- फिर अगर मालूम हो गया कि इस वक्त सुबह हो गई थी तो इस रोज़ा की कज़ा रखे और अगर कुछ मालूम न हो शक ही शक रह जावे तो कज़ा रखना वाजिब नहीं है लेकिन एहतियात की बात यह है कि इस की कज़ा रख लेवे
मसअलह 8
मुस्तहब यह है कि जब सूरज यक़ीन के तौर पर डूब जाए तो फ़ौरन रोज़ा खोल डाले देर कर के रोज़ा खोलना मकरूह है-
मसअलह 9
बदली के दिन जरा देर कर के रोज़ा खोलो जब खूब यकीन हो जाए कि सूरज डूब गया होगा तब इफ़तार करो और सिर्फ़ घड़ी वगैरह पर एतमाद (यकीन) न करो जब तक के तुम्हारा दिल गवाही न देदे क्यों कि घड़ी कुछ गलत हो गई हो बल्कि अगर कोई अज़ान भी कह देवे लेकिन अभी वक्त आने में कुछ शुबह (शक) है तब भी रोज़ा खोलना दुरुस्त नहीं-

मसअलह 10
छोहारे से रोज़ा खेलना बेहतर है या और कोई मीठी चीज़ हो उस से खोले वह भी न हो तो पानी से इफ़तार करे कुछ औरतें और कुछ मर्द नमक की कंकरी से इफ़तार करते हैं और इस में सवाब समझते हैं यह गलत अक़ीदह है-
मसअलह 11
जब तक सूरज डूबने में शक रहे तब तक इफ़तार करना जायज़ नहीं-

नोट = मसअलह 9 में जो बताया गया है जहाँ सुविधा मुहैया नहीं है उस के लिए है मसअलह 9

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