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Tuesday, 4 June 2019

June 04, 2019

ईदैन यानी दोनों ईद की नमाज़ का बयान

ईदैन यानी दोनों ईद की नमाज़ का बयान
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मसअलह 1
शव्वाल के महीने की पहली तारीख को (ईदु उल फ़ित्र) कहते हैं और ज़िलअलहिज्जा यानी बक़रईद के दसवीं तारीख को (ईदु उल अज़ह़ा)- यह दोनों दिन इसलाम में ईद और खुशी के दिन हैं- इन दोनों दिनों में दो दो रिकअत नमाज़ बत़ोर शुक्रिया के पढ़ना वाजिब है, जुमा की नमाज़ में खुतबा फ़र्ज और शर्त है और नमाज़ से पहले पढ़ा जाता है और ईदैन की नमाज़ में शर्त यानी फ़र्ज़ नहीं सुन्नत है और पीछे पढ़ा जाता है मगर ईदैन के खुतबे को सुनना भी मिष्ल जुमा के खुतबे के वाजिब है, यानी उस वक्त बोलना चालना नमाज़ पढ़ना सब हराम है ईद उल फ़ित्र के दिन तेरह (13) चीज़ेें मसनून यानी सुन्नत है- (1) शर्अ के मुवाफिक अपनी आराइश (सजावट) करना (2) ग़ुसुल करना (3) मिसवाक करना (4) अच्छे से अच्छे कपड़े जो पास मौजूद हों पहनना (5) खुशबू लगाना (6) सुबह को बहुत सवेरे उठना (7) ईदगाह में बहुत सवेरे जाना (8) ईदगाह जाने से पहले कोई शीरीं (मीठी) चीज़ मिस्ल छोहारे वगैरह खाना (9) ईदगाह जाने से पहले सदक़ा फ़ित्र दे देना (10) ईद की नमाज़ ईदगाह में जाकर पढ़ना यानी शहर की मसजिद में बिला उज्र (बिना बहाना) न पढ़ना (11) जिस रास्ते से जाए उस उस के सिवा दूसरे रास्ते से वापस आना (12) प्यादा पा यानी पैदल जाना (13) और रास्ते में اَللّٰہُ اَکْبَرْ اَللّٰہُ اَکْبَرْ لَآاِلٰہَ اِلَّااللّٰہُ وَاللّٰہُ اَکْبَرْ اَللّٰہُ       اَکْبَرْ وَلِللّٰہِ الْحَمْدُ ( अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर ला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर व लिल्लाहि अल हम्द) आहिस्ता आवाज़ से पढ़ते हुए जाना चाहिए-

ईदु उल फ़ित्र और ईदु अल अज़ह़ा की नमाज़ पढ़ने का तरीका
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मसअलह 2
ईदु उल फ़ित्र की नमाज़ पढ़ने का तरीका यह है कि नियत करे कि (दो रिकअत वाजिब नमाज़ ईद की छः वाजिब तकबीरों के साथ) अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बांध ले और सना पढ़े (सुबहा नकल्ललाहु म्मा व बिह़मदि क व तबा रकसमु क व तआला जद्दु क वला इला ह गैरु क) पढ़े फिर तीन तकबीर अल्लाहु अकबर कहते हुए दो मरतबा हाथ उठाए और तीसरी तकबीर में हाथ बांधले फिर इमाम सूरह फ़ातिहा और कोई सूरह मिला कर रुकू सजदह करेगा फिर दूसरी रिकअत के लिए खड़ा होने के बाद इमाम सूरह फ़ातिहा और कोई मिलाने के बाद चार तकबीर रुकू में जाने से पहले तीन मरतबा अल्लाहु अकबर कह कर हाथ उठाए और छोड़ दे चौथी तकबीर में बिना हाथ उठाए रुकू में चला जाए और इमाम के पीछे नमाज़ पूरी करे
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मसअलह 3
(ईदु उल अज़ह़ा) की नमाज़ का भी यही तरीका है और इस में भी वह सब चीज़ें सुन्नत हैं जो (ईदु उल फ़ित्र) में हैं, फ़र्क बस इतना है कि (ईदु उल अज़ह़ा) की नियत में बजाए ईदु अल फ़ित्र के (ईदु उल अज़ह़ा) का शब्द कहे- ईदु अल फ़ित्र में ईद गाह जाने से पहले कोई चीज़ खाना मसनून (सुन्नत) है यहाँ नहीं- और ईदु उल फ़ित्र में रास्ते में चलते वक्त आहिस्ता तकबीर कहना सुन्नत है और यहाँ ज़ोर आवाज़ से- और ईदु अल फ़ित्र की नमाज़ देर कर के पढ़ना मसनून (सुन्नत) है और ईदु अल अज़ह़ा के सवेरे- और यहाँ सदक ए फ़ित्र नहीं बल्कि बाद में कुरबानी है अहले वुसअत पर, और आज़ान व अक़ामत न यहाँ है न वहां-

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Wednesday, 22 May 2019

May 22, 2019

कज़ा रोज़े का बयान

कज़ा रोज़े का बयान

कज़ा रोज़े का बयान, qaza roze ka bayan,
qaza roze ka bayan

मसअलह 1
जो रोज़े किसी वजह से जाते रहे यानी कज़ा हो गए हों. रमज़ान के बाद जहाँ तक जल्दी हो सके उनकी कज़ा रख ले देर न करे बेवजह कज़ा रखने में देर लगाना गुनाह है-
मसअलह 2
रोज़े की कज़ा में दिन तारीख़ मोकर्रर कर के कज़ा की नियत करना कि फ़लाँ तारीख के रोज़े की कज़ा रखता हूँ यह ज़रूरी नहीं है बल्कि जितने रोज़े कज़ा हों उतने ही रोज़े रख लेना चाहिए- अलबत्ता अगर दो रमज़ान के कुछ कुछ रोज़े कज़ा हो गए इस लिए दोनों साल के रोज़ों की कज़ा रखना है तो साल का मोकर्रर करना ज़रूरी है यानी इस तरह नियत करे कि फ़लाँ साल के रोज़ों की कज़ा रखता हूँ-
मसअलह 3
कज़ा रोज़े में रात से नियत करना ज़रूरी है अगर सुबह हो जाने के बाद नियत की तो कज़ा सही नहीं हुई बल्कि वह रोज़ा नफ़ल हो गया कज़ा रोज़ा फिर से रखे-
मसअलह 4
कफ़्फ़ारे के रोज़े का भी यही हुक्म है कि रात से नियत करना चाहिए अगर सुबह होने के बाद नियत की तो कफ़्फ़ारह का रोज़ा सही नहीं हुआ-
मसअलह 5
जितने रोज़े कज़ा हो गए हैं चाहे सब को एक दम से रख लेवे चाहे थोड़े थोड़े कर के रखे दोनों बातें दुरुस्त हैं-
मसअलह 6
अगर रमज़ान के रोज़े अभी कज़ा नहीं रखे और दूसरा रमज़ान आ गया तो ख़ैर अब रमज़ान के अदा रोज़े रखे और ईद के बाद कज़ा रखे लेकिन इतनी देर करना बुरी बात है-
मसअलह 7
रमज़ान के महीने में दिन को बेहोश हो गया और एक दिन से ज़्यादा बेहोश रहा तो बेहोश होने के दिन के अलावा जितने दिन बेहोश रहा उतने दिनों की कज़ा रखे- जिस दिन बेहोश हुआ उस एक दिन की कज़ा वाजिब नहीं है क्योंकि उस दिन का रोज़ा ब वजह (कोई वजह नहीं) नियत के दुरुस्त हो गया- हाँ अगर उस दिन रोज़ा से न था या उस दिन ह़लक में कोई दवा डाली गई और वह ह़लक से उतर गई तो उस दिन की कज़ा भी वाजिब है-
मसअलह 8
और अगर रात को बेहोश हुआ हो तब भी जिस रात को बेहोश हुआ उस एक दिन की कज़ा वाजिब नहीं है बाक़ी और जितने दिन बेहोश रहा सब की कज़ा वाजिब है हाँ अगर उस रात को सुबह का रोज़ा रखने की नियत न थी या सुबह को कोई दवा ह़लक में डाली गई तो उस दिन का रोज़ा भी कज़ा रखे-
मसअलह 9
अगर सारे रमज़ान भर बेहोश रहे तब भी कज़ा रखना चाहिए यह न समझे कि सब रोज़े माफ हो गए- अलबत्ता अगर जुनून (पागल) हो गया और पूरे रमज़ान भर सड़न दिवाना रहा तो इस रमज़ान के किसी रोज़े की कज़ा वाजिब नहीं और अगर रमज़ान शरीफ के महीने में किसी दिन जुनून (पागल पन) जाता रहा और अकल ठिकाने हो गया तो अब से रोज़े रखने शुरू करे और जितने रोज़े जुनून में गए उन की कज़ा भी रखे-

नोट = कफ़्फ़ारह का मतलब है कि रमज़ान शरीफ के रोज़े जान बूझ कर तोड़ डालने पर लगातार दो महीने रोज़े रखे थोड़े थोड़े कर के रोज़े रखने से दुरुस्त नहीं या साठ 60 फ़कीर को खाना खिलाए
दूसरा कफ़्फ़ारह क़सम खाने का है अगर किसी ने क़सम तोड़ दिया यानी क़सम को पूरा न किया तो उस के लिए कफ़्फ़ारह है दस मुहताजों (फ़कीर) को दो वक्त खाना खिला दे
कफ़्फ़ारह के बारे में इंशाअल्लाह फिर कभी दूसरे पोस्ट में पूरे तफ़सील (विवरण) से बताऊँगा

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Saturday, 18 May 2019

May 18, 2019

जिन वजहों (कारण) से रोज़ा तोड़ देना जायज़ है उन के बारे में ज़रूरी बातें

जिन वजहों (कारण) से रोज़ा तोड़ देना जायज़ है उन के बारे में ज़रूरी बातें

मसअलह 1
अचानक ऐसी बीमार पड़ गई कि अगर रोज़ा न तोड़ेगा तो जान पर बन आएगा या बीमारी बहुत बढ़ जाएगी तो रोज़ा तोड़ देना दुरुस्त है जैसे दफअतन (किसी दफा) पेट में ऐसा दर्द उठा कि बेताब हो गया या साँप ने काट खाया तो दवा पी लेना और रोज़ा तोड़ देना दुरुस्त है ऐसे ही अगर ऐसी प्यास लगा कि हलाकत का डर है तो भी रोज़ा तोड़ डालना दुरुस्त है-
मसअलह 2
हामला (गर्भवती Pregnant) औरत को कोई ऐसी बात पेश आ गई जिस से अपनी जान का या बच्चा की जान का डर है तो रोज़ा तोड़ डालना दुरुस्त है-
मसअलह 3
खाना पकाने की वजह से बेहद प्यास लग आई और इतनी बेताबी हो गई कि अब जान का खौफ (डर) है तो रोज़ा तोड़ देना दुरुस्त है- लेकिन अगर खुद उसने क़सदण (इरादा) से इतना काम किया जिस से ऐसी हालत हो गई तो गुनहगार होगी-

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Thursday, 16 May 2019

May 16, 2019

सेहरी खाने और इफ़तार करने की ज़रूरी बातें

सेहरी खाने और इफ़तार करने का बयान

मसअलह 1
सेहरी खाना सुन्नत है अगर भूक न हो और खाना न खाए तो कम से कम दो तीन छोहारे ही खाले - या कोई और चीज़ थोड़ी बहुत खाले कुछ न सही तो थोड़ा सा पानी ही पी लेवे-
मसअलह 2
अगर किसी ने सेहरी न खाई और उठ कर एक आध पान खा लिया तो भी सेहरी खाने का सवाब मिल गया -
मसअलह 3
सेहरी में जहाँ तक हो सके देर कर के खाना बेहतर है लेकिन इतनी देर न करे कि सुबह होने लगे और रोज़ा में शुबह (शक) पड़ जाए -
मसअलह 4
अगर सेहरी बड़ी जल्दी खाली मगर इसके बाद पान तम्बाकू चाय पानी देर तक खाता पीता रहा जब सुबह होने थोड़ी देर रह गई तब कुल्ली कर डाला तब भी देर करके खाने का सवाब मिल गया और इस का हुक्म भी वही है जो देर करके खाने का हुक्म है-
मसअलह 5
अगर रात को सेहरी खाने के लिए आँख न खुली सब के सब सो गए तो बेसेहरी खाए सुबह का रोज़ा रखो सेहरी छूट जाने से रोज़ा छोड़ देना बड़ी कम हिम्मती की बात और बड़ा गुनाह है-
मसअलह 6
किसी आँख देर में खुली और यह ख्याल हुआ कि अभी रात बाक़ी है इस गुमान पर सेहरी खाली फिर मालूम हुआ कि सुबह हो जाने के बाद सेहरी खाई खी तो रोज़ा नहीं हुआ कज़ा रखे और कफ़्फ़ारह वाजिब नहीं लेकिन फिर भी कुछ खाए पिये नहीं रोज़ादारों की तरह रहे - इसी तरह सूरज डूबने के गुमान से रोज़ा खोल लिया फिर मालूम हुआ कि सूरज नहीं डूबा तो रोज़ा जाता रहा इस की कज़ा करे कफ़्फ़ारह वाजिब नहीं जब तक सूरज न डूब जाए कुछ खाना पीना दुरुस्त नहीं-
मसअलह 7
अगर इतनी देर हो गई कि सुबह हो जाने का शुबह (शक) पड़ गया तो अब कुछ खाना मकरूह है और अगर ऐसे वक्त कुछ खा लिया या पानी पी लिया तो बुरा किया और गुनाह हुआ- फिर अगर मालूम हो गया कि इस वक्त सुबह हो गई थी तो इस रोज़ा की कज़ा रखे और अगर कुछ मालूम न हो शक ही शक रह जावे तो कज़ा रखना वाजिब नहीं है लेकिन एहतियात की बात यह है कि इस की कज़ा रख लेवे
मसअलह 8
मुस्तहब यह है कि जब सूरज यक़ीन के तौर पर डूब जाए तो फ़ौरन रोज़ा खोल डाले देर कर के रोज़ा खोलना मकरूह है-
मसअलह 9
बदली के दिन जरा देर कर के रोज़ा खोलो जब खूब यकीन हो जाए कि सूरज डूब गया होगा तब इफ़तार करो और सिर्फ़ घड़ी वगैरह पर एतमाद (यकीन) न करो जब तक के तुम्हारा दिल गवाही न देदे क्यों कि घड़ी कुछ गलत हो गई हो बल्कि अगर कोई अज़ान भी कह देवे लेकिन अभी वक्त आने में कुछ शुबह (शक) है तब भी रोज़ा खोलना दुरुस्त नहीं-

मसअलह 10
छोहारे से रोज़ा खेलना बेहतर है या और कोई मीठी चीज़ हो उस से खोले वह भी न हो तो पानी से इफ़तार करे कुछ औरतें और कुछ मर्द नमक की कंकरी से इफ़तार करते हैं और इस में सवाब समझते हैं यह गलत अक़ीदह है-
मसअलह 11
जब तक सूरज डूबने में शक रहे तब तक इफ़तार करना जायज़ नहीं-

नोट = मसअलह 9 में जो बताया गया है जहाँ सुविधा मुहैया नहीं है उस के लिए है मसअलह 9

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Tuesday, 14 May 2019

May 14, 2019

रमज़ान शरीफ के रोज़े के बारे में ज़रूरी बातें

रमज़ान शरीफ के रोज़े का बयान


मसअलह 1
रमज़ान शरीफ के रोज़े की अगर रात से नियत करले तो भी फ़र्ज अदा हो जाता है और अगर रात को रखने का इरादा न था बल्कि सुबह हो गई तब भी यही ख्याल रहा कि मैं आज का रोज़ा न रखूँगा फिर दिन चढ़े ख्याल आ गया कि फर्ज़ रोज़ा छोड़ देना बुरी बात है इस लिए अब रोजा की नियत कर लिया तब भी रोजा हो गया लेकिन अगर सुबह को कुछ खा पी चुका हो तो अब नियत नहीं कर सकता-

मसअलह 2
अगर कुछ खाया पिया न हो तो दिन को ठीक दोपहर से एक घंटा पहले रमज़ान के रोज़े की नियत कर लेना दुरुस्त है-
मसअलह 3
रमज़ान शरीफ के रोज़े में बस इतनी नियत कर लेना काफी है कि आज मेरा रोज़ा है या रात को इतना सोचले कि कल मेरा रोज़ा है बस इतनी ही नियत से भी रमज़ान का रोज़ा अदा हो जाएगा अगर नियत में खास यह बात न आई हो कि रमज़ान का रोज़ा है या फर्ज़ रोज़ा है तब भी रोजा हो जाएगा-
मसअलह 4
रमज़ान के महीने में अगर किसी ने यह नियत की कि मैं नफ़ल का रोज़ा रखूँगा रमज़ान का रोजा न रखूँगा बल्कि इस रोजा़ की फिर कभी कज़ा रख लूँगा तब भी रमज़ान ही का रोज़ा हुवा और नफ़ल का न हुवा-
मसअलह 5
पिछले रमज़ान का रोज़ा कज़ा हो गया था और पूरा साल गुज़र गया अब तक इसकी कज़ा नहीं रखा फिर जब रमज़ान का महीना आ गया तो इसी कज़ा की नियत से रोज़ा रखा तब भी रमज़ान ही का रोज़ा होगा और कज़ा का रोज़ा न होगा कज़ा का रोज़ा रमज़ान के बाद रखे
मसअलह 6
किसी ने नज़्र (भेंट) मानी थी की अगर मेरा फलाँ काम हो जाएगा तो मैं अल्लाह के लिए दो रोज़े या एक रोज़ा रखूँगा फिर जब रमज़ान का महीना आया तो उसने उसी नज़्र (भेंट) के रोज़े रखने की नियत किया रमज़ान के रोज़े की नियत नहीं किया तब भी रमज़ान ही का रोज़ा हुवा नज़्र (भेंट) का रोज़ा अदा नहीं हुवा नज़्र के रोज़े रमज़ान के बाद फिर रखे सब का खुलासा (सारांश Abstract) यह हुआ कि रमज़ान के महीने में जब किसी रोज़े नियत करेगा तो रमज़ान का ही रोज़ा होगा और कोई रोज़ा सही न होगा-
मसअलह 7 
शाबान (रमज़ान शुरू होने से पहले के महीने) की उनतीसवीं तारीख को अगर रमज़ान शरीफ के चाँद निकल आए तो सुबह को रोज़ा रखो और अगर न निकले या आसमान पर अब्र (बादल) हो और चाँद न दिखाई दे तो सुबह को जब तक यह शुबह (शक) रहे कि रमज़ान शुरू हुवा या नहीं रोज़ा न रखो, बल्कि शाबान के तीस दिन पूरे कर के रमज़ान के रोज़े शुरू करो-

मसअलह 8
उनतीसवीं तारीख को अब्र (बादल) की वजह से रमज़ान शरीफ का चाँद नहीं दिखाई दिया तो सुबह को नफ़ल रोज़ा भी न रखो हाँ अगर ऐसा इत्तिफ़ाक़ पड़ा कि हमेशा सोमवार और जुमेरात या किसी और मुक़र्र (निश्चित) दिन का रोज़ा रखा करता था और कल वही दिन है तो नफ़ल की नियत से सुबह को रोज़ा रख लेना बेहतर है फिर अगर कहीं से चाँद की खबर आ गई तो उसी नफ़ल रोज़े से रमज़ान का फ़र्ज़ अदा हो गया अब उसकी कज़ा न रखे-
मसअलह 9
बदली की वजह से उनतीसवीं तारीख को रमज़ान का चाँद नहीं दिखाई दिया तो दोपहर से एक घंटा पहले तक कुछ न खाओ पियो अगर कहीं से खबर आ जाए तो अब रोज़ा की नियत करलो और खबर न आए तो खाओ पियो-

मसअल 10
उनतीसवीं तारीख को चाँद नहीं हुवा तो ख्याल न करो कि कल का दिन रमज़ान का तो है नहीं लाओ मेरे ज़िम्मा जो पार साल का एक रोज़ा कज़ा है उसकी कज़ा ही रखलूँ- या कोई नज़्र मानी थी कि उसका रोज़ा रखलूँ ; उस दिन कज़ा का रोज़ा और कफ्फारा (प्रायश्चित) का रोज़ा और नज़्र का. रखना भी मकरूह है, कोई रोज़ा न रखना चाहिए अगर कज़ा या नज़्र का रोज़ा रख लिया फिर कहीं से चाँद की खबर आ गई तो भी रमज़ान ही का रोज़ा अदा हो गया कज़ा और नज़्र का रोज़ा फिर से रखे और अगर खबर नहीं आई तो जिस रोज़ा की नियत किया था वही अदा हो गया-

नोट = मसअलह के मतलब पिछले पोस्ट में बता दिया गया है अगर मालूम नहीं तो बता देते हैं मसअलह को अंग्रेजी में issue हिन्दी में समस्या कहते हैं

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