Monday, 3 May 2021

माज़ूर के एहकाम

MAZOOR KE AHKAAM KA BAYAN जिस की ऐसी नकसीर फूटी हो (नाक से खून बहता हो) कि किसी तरह बंद नहीं होती या कोई ऐसा ज़ख्म है कि बराबर बहता रहता है किसी वक़्त बंद नहीं होता या पेशाब की बीमारी है कि हर वक़्त क़तरा आता रहता है, इतना वक़्त नहीं मिलता कि वज़ू से नमाज़ पढ़ सके तो ऐसे शख्स को माज़ूर जकहते हैं, इस का हुक्म यह है कि हर नमाज़ के वक़्त वज़ू कर लिया करे- जब तक वज़ू रहे तब तक वज़ू बाक़ी रहेगा- इस की मिसाल यह है कि किसी की नकसीर फूटी है कि किसी तरह से बंद नही होती उस ने ज़ोहर के वक़्त वज़ू कर लिया- जब तक ज़ोहर के वक़्त रहेगा उस का वज़ू न टूटेगा जब यह वक़्त चला गया दूसरी नमाज़ का वक़्त आ गया तो अब दूसरे वक़्त का दूसरा वज़ू करना चाहए इसी तरह हर नमाज़ के वक़्त वज़ू कर लिया करे, और इस वज़ू से फ़र्ज़ नफल जो चाहे नमाज़ पढ़े- मसअलह :-1 अगर फजर के वक़्त वज़ू किया तो आफताब (सूरज) निकलने के बाद इस वज़ू से नमाज़ नही पढ़ सकता, दूसरा वज़ू करना चाहए, और जब सूरज निकाने वक़्त वज़ू किया तो इस वज़ू से ज़ोहर की नमाज़ पढ़ना दुरुस्त है, ज़ोहर के वक़्त नया वज़ू करने की ज़रूरत नहीं है- जब असर के वक़्त आएगा तब नया वज़ू करना पड़ेगा- मसअलह :-2 किसी के ऐसा ज़ख्म था कि हर वक़्त बहा करता था उस ने वज़ू किया और दूसरा ज़ख्म पैदा हो गया और बहने लगा तो वज़ू टूट गया, फिर से वज़ू करे- मसअलह :-3 आदमी माज़ूर जब बनता है और यह हुक्म जब लगाते हैं कि जब पूरा एक नमाज़ का वक़्त इसी तरह गुज़र जाए कि खून बराबर बहा करे और इतना भी वक़्त न मिले उस वक़्त की नमाज़ तहारत से पढ़ सके, अगर इतना वक़्त मिल गया कि इस में तहारत से यानि वजू के हालत में नमाज़ पढ़ सकता है तो इस को माज़ूर न कहेंगे- हाँ पूरा एक वक़्त इसे तरह गुज़र गया कि इस को तहारत से नमाज़ पढ़ने का मौक़ा नहीं मिला यह माज़ूर हो गया, अब इस का वही हुक्म है कि हर वक़्त नया वज़ू कर लिया करे, फिर जब दूसरा वक़्त आए तो इस में हर वक़्त खून बहना शर्त नहीं है बल्कि वक़्त भर में अगर एक बार भी खून आ जाया करे और सारे वक़्त बंद रहे तो भी माज़ूर रहेगा, हाँ अगर इस के बाद एक पूरा वक़्त ऐसा गुज़र जाए जिस में खून बिल्कुल न आए तो अब माज़ूर नहीं रहा, अब इस का हुक्म यह है कि जितनी बार खून बहेगा वज़ू टूट जाएगा- मसअलह :-4 ज़ोहर के वक़्त हो गया तब खून बहना शुरू हुआ तो आखीर वक़्त तक इन्तिज़ार करे- अगर बंद हो जाए तो खेर नहीं तो वज़ू कर के नमाज़ पढ़ ले फिर अगर असर के पूरे वक़्त में इसी तरह बह गया कि नमाज़ पढ़ने की मुहलत न मिली तो अब असर का वक़्त गुज़रने के बाद माज़ूर होने का हुक्म लगा दें और असर के वक़्त के अंदर ही अंदर बंद हो गया तो वह माज़ूर नहीं है- जो नमाज़ें इतनी वक़्त में पढ़ीं हैं वह दुरुस्त नहीं हुईं, फिर से पढ़ें- मसअलह :-5 ऐसे माज़ूर ने पेशाब या पाखाना की वजह से वज़ू किया और जिस वक़्त वज़ू किया था उस वक़्त खून बंद था जब वज़ू कर चुका तो खून आया तो इस खून के निकलने वज़ू टूट जाएगा हां जो वज़ू नकसीर वग़ैरा की सबब से किया है खास वह वज़ू नकसीर की वजह से नहीं टूटा- मसअलह :-6 यह खून वग़ैरा कपड़े में लग जाए तो देखो अगर ऐसा हो कि नमाज़ खत्म करने से पहले ही लग जाएगा तो उस का धोना वाजिब नहीं है और अगर यह मालूम हो कि इतनी जल्दी न भरेगा कि नमाज़ तहारत से अदा हो जाएगी तो धो डालना वाजिब है अगर एक रुपिया से बढ़ जाए (यानि एक रुपिया के गोलाई के बराबर) तो बे धोए नमाज़ न होगी-

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