Thursday, 30 April 2020

क़ज़ा रोज़े का बयान qaza roza ka bayan

क़ज़ा रोज़े का बयान

qaza roza ka bayan in hindi क़ज़ा रोज़े का बयान हिन्दी में
Qaza roze ka bayan

जो रोज़े किसी वजह से क़ज़ा हो गए हों रमजान के बाद जहाँ तक जल्दी हो सके उनकी क़ज़ा रख ले देर न करे- बे वजह क़ज़ा रखने में देर लगाना गुनाह है-
रोज़े की क़ज़ा में दिन तारीख मुक़र्रर कर के क़ज़ा की नियत करना कि फलां तारीख के रोज़े की क़ज़ा रखता हूँ यह ज़रूरी नहीं है बल्कि जितने रोज़े क़ज़ा हों उतने ही रोज़े रख लेना चाहए- हाँ अगर दो रमज़ान के कुछ कुछ रोज़े क़ज़ा हो गए इस लिए दोनों साल के रोज़ों की क़ज़ा रखना है तो साल का मुक़र्रर करना ज़रूरी है यानि इस तरह नियत करना की फलां साल के रोज़ों की क़ज़ा रखता हूँ-
क़ज़ा रोज़े में रात से नियत करना ज़रूरी है अगर सुबह हो जाने के बाद नियत की तो क़ज़ा सही नहीं हुई बल्कि वह रोज़ा नफल हो गया क़ज़ा का रोज़ा फिर से रखे-
qaza roza ka bayan in hindi क़ज़ा रोज़े का बयान हिन्दी में
Fast sehri

कफ़्फ़ारे के रोज़े का भी यही हुक्म है कि रात से नियत करना चाहए- अगर सुबह होने के बाद नियत की तो कफ़्फ़ारा का रोज़ा सही नहीं हुआ-
जितने रोज़े क़ज़ा हो गए हैं चाहे सब को एक दम से रख ले चाहे थोड़े थोड़े कर के दोनों बातें दुरुस्त हैं-
अगर रमजान के रोज़े अभी क़ज़ा नहीं रखे और दूसरा रमजान आ गया तो खैर अब रमजान के अदा रोज़े रखे और ईद के बाद क़ज़ा रखे लेकिन इतनी देर करना बुरी बात है-
रमजान के महीने में दिन को बेहोश हो गया और एक दिन से ज़ियादा बेहोश रहा तो बेहोश होने के दिन के इलवाह जितने दिन बेहोश रहा इतने दिनों की क़ज़ा रखे- जिस दिन बेहोश हुआ उस एक दिन की क़ज़ा वाजिब नहीं है क्योंकि उस दिन का रोज़ा ब्वजह से नियत के दुरुस्त हो गया- हाँ अगर उस दिन रोज़ा से न था या उस दिन हलक़ में कोई दावा डाली गई और वह हलक़ से उतर गई तो उस दिन की क़ज़ा भी वाजिब है-
qaza roza ka bayan in hindi क़ज़ा रोज़े का बयान
Unconscious man

और अगर रात को बेहोश हुआ हो तब भी जिस रात को बेहोश हुआ उस एक दिन की क़ज़ा वाजिब नहीं है और जितने दिन बेहोश रहा सब की क़ज़ा वाजिब है हाँ अगर उस रात को सुबह का रोज़ा रखने की नियत न थी या सुबह को कोई दावा हलक़ में डाली गई तो उस दिन का भी क़ज़ा रखे-
अगर सारे रमजान भर बेहोश रहे तब भी क़ज़ा रखना चाहए यह न समझे कि सब रोज़े माफ़ हो गए- हाँ अगर जुनून यानि पागल पन हो गया और पुरे रमजान भर दीवाना रहा तो इस रमजान के किसी रोज़े की क़ज़ा वाजिब नहीं और अगर रमजान शरीफ के महीने में किसी दिन जुनून जाता रहा यानि अच्छा हो गया और अक्ल ठिकाने हो गई तो अब से रोज़े रखने शुरू करे और जितने रोज़े जुनून में गए उन की भी क़ज़ा रखे-   (बिहिश्ती ज़ेवर)

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