Thursday, 19 March 2020

शेख़ शिबली (रहमतुल्लाहि अलैह) मोहब्बत व मारिफ़त की दुकान में

शेख़ शिबली (रहमतुल्लाहि अलैह) की ज़िंदगी बदल गई

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Gandhak ki dukan

हज़रत जुनेद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) की खिदमत में पहुंचे तो कहा कि हज़रत आप के पास बातनी (अंदुरूनी) नेमत है- आप यह नेमत अता करें चाहे इस को मुफ्त दे दें या चाहें तो कीमत तलब करें- हज़रत ने फरमाया कि कीमत मांगे तो तुम दे नहीं सकोगे और अगर मुफ्त दे दें तो तुम्हें इस की क़दर नहीं होगी- गवर्नर ने कहा फिर आप जो चाहें मैं वही करने के लिए तैयार हूँ- हज़रत जुनैद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने फरमाया कि यहां कुछ दिन रहो- जब हम दिल के आईने को साफ पाएंगे तो यह नेमत अलका (डाल देंगे) और अता कर देंगे- कई माह के बाद हज़रत ने पूछा कि तुम किया करते हो- कहने लगा फलां इलाके का गवर्नर हूँ- फरमाया अच्छा जाओ बोगदाद शहर में गंधक की दुकान बनाओ
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गवर्नर साहब ने शहर में गंधक की दुकान बना ली- एक तो गंधक की बदबू और दूसरे खरीदने वाले आममतुन नास (आम आदमी) की बहस व तकरार से गवर्नर साहब की तबियत बहुत बेज़ार होती- किसी तरह से एक साल गुज़रा तो हज़रत की खिदमत में अर्ज़ किया हज़रत एक साल की मुद्दत पूरी हो गई है- हज़रत जुनैद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने फरमाया, अच्छा तुम दिन गिनते रहे हो जाओ एक साल दुकान और चलाओ- अब तो दिमाग ऐसा साफ हुआ कि दुकान करते करते साल से ज़्यादा दिन गुज़र गया मगर वक़्त का हिसाब न रखा- एक दिन हज़रत ने फरमाया गवर्नर साहब आप का दूसरा साल मुकम्मल हो गया- अर्ज़ किया पता नहीं- हज़रत ने कशकूल (फक़ीरों का पियाला) हाथ में दे कर फरमाया जाओ बोगदाद शहर में भीक मांगो- गवर्नर साहब ने हैरान रह गए हज़रत ने फरमाया अगर नेमत के तलबगार हो तो हुक्म की तामील करो (हुक्म मानो) वरना जिस रास्ते से आये हो उधर से वापस चले जाओ- गवर्नर साहब ने तुरंत कशकूल हाथ में पकड़ा और बोगदाद शहर में चले गए- चंद लोगों को एक जगह देखा और हाथ आगे बढ़ाया कि अल्लाह के नाम पर कुछ दे दो, उन्हों ने चेहरा देखा तो फ़क़ीर का चेहरा लगता ही नहीं था- इस लिए उन्हों ने कहा काम चोर शर्म नहीं आती मांगते हुए- जाओ मेहनत मज़दूरी कर के खाओ- गवर्नर साहब ने जली कटी सुन कर गुस्से का घोंट पिया- और अजीब बात तो यह थी कि पूरा साल दरयूज़ह गिरी करते रहे (भीख मांगते रहे)किसी ने कुछ न दिया हर एक ने झुंड़कियाँ दीं- यह बातनी (अंदरुनी) इस्लाह का तरीक़ा था- हज़रत जुनैद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) गवार साहब के दिल से अजब और तकब्बुर (घमंड) निकालना चाहते थे- चुनाँचि एक साल मख़लूक़ के सामने हाथ फैला कर गवर्नर साहब के दिल में यह बात उतर गई कि मेरी कोई वकअत (पहचान) नहीं और मांगना होतो मख़लूक़ की बजाए ख़ालिक़ (अल्लाह) से मांगना चाहये- पूरा साल इसी काम में गुज़र गया-.....
एक दिन हज़रत जुनैद बोगदादी ने बुला कर कहा कि गवर्नर साहब आप का नाम किया है? अर्ज़ किया शिबली, फरमाया अच्छा अब हमारे महफ़िल में बैठा करें- गोया तीन साल के मुजाहिदे के बाद अपनी मजलिस में बैठने की इजाज़त दी मगर शिबली (रहमतुल्लाहि अलैह) के दिल का बर्तन पहले ही साफ हो चुका था- अब हज़रत के एक एक बात से सीने में नूर भारत गया और आंखें बसीरत से माला माल होती गईं- आखिर में हज़रत जुनैद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने एक दिन बुलाया औए फरमाया: कि शिबली आप नहाविन्द के इलाके के गवर्नर रहे हैं आप ने किसी पर ज़ियादती की होगी किसी का हक़ दबाया होगा-
आप एक फहरिस्त मुरत्तब (लिस्ट तैयार) करें कि किस का हक़ आपने पामाल किया- आप ने फहरिस्त बनाना शुरू की- हज़रत की तो जिहात (कामयाबियां) थीं चुनाँचि तीन दिन में कई सफहात(पेज) पर मुश्तमिल तावील बहुत बड़ा फहरिस्त (लिस्ट) तैयार हो गई- हज़रत जुनैद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने फरमाया कि बातिन की निस्बत उस वक़्त तक नसीब नहीं हो सकती जब तक कि मामलात में सफाई न हो- जाओ उन लोगों से हक़ माफ करवाके आओ- चुनाँचि आप नहाविन्द तशरीफ़ ले गए और एक एक आदमी से माफी मांगी- कुछ तो जल्द माफ कर दिया कुछ ने कहा कि तुम ने हमें बहुत ज़लील किया था हैम उस वक़्त तक माफ नहीं करेंगे जब तक तुम इतनी देर धूप में खड़े न रहो- कुछ ने कहा हैम उस वक़्त तक माफ न करेंगे जब तक कि हमारे मकान की तामीर में मज़दूर बन कर काम न करो, आप हर आदमी के ख्वाहिश के मुताबिक़ उस की शर्त पूरी करते, और उस से हक़ बख्शवाते रहे यहां तक कि दो साल बाद वापस बोगदाद पहुंचे- अब आप को ख़ानक़ाह में आये हुए पांच साल का दिन गुज़र गया था- मुजाहिदे और रियाजत (मेहनत व मुशक़्क़त) की चक्की में पिस पिस कर नफ़्स मर चुका था- ,,मैं,,, निकल गई थी बातिन में तू ही तू के नारे थे- बस रहमत ए इलाही ने जोश मारा और एक दिन हज़रत जुनैद बोगदादी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने उन्हें बातनी निस्बत से माला माल कर दिया- बस फिर किया था, आंख देखना बदल गया, पांव चलना बदल गया, दिल व दिमाग की सोच बदल गई गफलत के ताना बाना बिखर गए- मारिफ़त इलाही से सीना पुर नूर हो कर खज़ीना बन गया और आप आरिफुल्लाह बन गए-

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