Wednesday, 18 March 2020

औरंगजेब आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) और एक बहरूपिया

औरंगजेब आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) और एक बहरूपिया

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Aurangzeb bahrupiya

जब औरंगजेब आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) की तख़्त नशीनी का जलसा हुआ तो काम के लोगों को अताया (तोहफा) दिए गए, एक बहरूपिया भी मांगने आया- मगर आलमगीर रहमतुल्लाहि अलैह आलिम थे इस को किस मद से देते और वैसे साफ़ इंकार करना भी आदाब ए शाही के एतिबार से अच्छा नहीं लगा चुपके से टालना चाहा, उस से कहा कि इनाम किसी कमाल पर होता है कि नाआशना सूरत में आओ मगर वह भी भेस बदल कर आया- बादशाह ने पहचान लिया कभी धोका नहीं खाया कि जिस रोज़ धोका दे देगा- इनाम का मुस्तहिक़ (हकदार) ठेरेगा, अचानक से औरंगजेब आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) को सफर दकण का दरपेश था- बहरूपिया दाढ़ी बढ़ा कर, मुक़द्दस लोगों की सूरत बना कर रास्ता में किसी गाँव में जा बैठा कुछ रोज़ के बाद शोहरत हो गई- आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) की आदत थी कि जहां जाते थे उलमां फ़ोक़रा (आलिमों और गरीबों) से जरूर मिलते थे, चुनाँचि जब इस मुक़ाम पर पहुंचे वहाँ शोहरत सुन कर अव्वल (पहली बार) वज़ीर को उस के पास भेजा, वज़ीर ने कुछ मसाइल तसव्वुफ़ के पूछे उस ने सब के जवाब सही दिए- बात यह थी कि इस वक़्त बहरूपिया हर कला को इरादा से हासिल करते थे- वज़ीर ने औरंगजेब आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) से बहुत तारीफ की- औरंगजेब आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) खुद मिलने गए- आपस में खूब बात चीत हो रही और खूब समझ कि.... शाह साहब कामिल शख्स हैं- चलते वक़्त एक हज़ार अशर्फियाँ (उस ज़माने का रूपया पैसा) बतौर ए नज़र पेश कीं

उस ने लात मारी और कहा कि तू अपनी तरह हम को भी सग ए दुनिया ख्याल करता है इस से भी और यकीन बढ़ा- वाक़ई इस्तिग्ना (अलग थलग) भी अजीब चीज़ है-  आलमगीर (रहमतुल्लाहि अलैह) लश्कर में वापस चले आए पीछे पीछे बहरूपिया साहब पहुंचे कि लाये इनाम खुदा हुज़ूर को सलामत रखे- बादशाह ने कहा, अरे तू था, गर्ज़ इनाम दिया मगर मामूली, और कहा कि उस वक़्त जो पेश किया था उस को क्यों नहीं लिया था वह तो इस से बहुत ज्यादा था और मैं इस को वापस थोड़ा ही लेता उस ने कहा कि हुज़ूर अगर मैं लेता तो नक़ल सही न होती, क्योंकि वह फक़ीरी का रूप था, और फ़क़ीर के शान के खेलाफ था-

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