Monday, 16 March 2020

गुलाम के साथ हुस्न ए सुलूक (अच्छा बर्ताओ)

गुलाम के साथ हुस्न ए सुलूक (अच्छा बर्ताओ)

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Mahmood gaznavi

सुलतान महमूद (रह्मतुल्ललाहि अलैह) को मुखालिफीन (विरोधियों) बहुत बदनाम करते हैं__ कि उन्हों ने तलवार से इस्लाम फैलाया है- मगर तारीख (इतिहास) में इन का एक वाक़या लिखा है कि इस से उन की रहम दिली और शफ़क़त का अंदाजा हो जाएगा और यह कि गुलामों के साथ उन का किया बर्ताओ था-
एक बार सुलतान महमूद (रहमतुल्लाहि अलैह) ने हिंदुस्तान पर हमला किया और बहुत से हिन्दू __ जंग में क़ैद हुए जिन को अपने साथ ग़ज़नी ले गए इन में एक गुलाम बहुत होनहार व होशियार था- इस को आज़ाद कर के सुलतान ने हर किस्म के उलूम ए फुनून (विज्ञान और कला) की तालीम दी- जब वह तालीम से फारिग हुआ तो उस को हुकूमत के ओहदे (पद) दिए गए- यहां तक कि उस को एक बड़े मुल्क का सूबेदार  बना दिया गया सूबा गौर की हैसियत से उस वक़्त वह थी जो आज कल के बड़े वाली ए रियासत की हैसियत होती है- जिस वक़्त सुलतान ने उस को तख़्त पर बिठाया और ताज सर पर रखा तो वह गुलाम रोने लगा- सुलतान ने फरमाया कि यह वक़्त खुशी का है या ग़म का_____ उस ने कहा जहां पनाह इस वक़्त मुझे अपने बचपन का एक वाक़या याद आ कर फिर अपनी यह क़द्र व मन्ज़िलत देख कर रोना आ गया ______ हुज़ूर जिस वक़्त मैं हिंदुस्तान में बच्चा था आप के जुमले (शब्द) सुन कर हिन्दू कांपते थे
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और उन की औरतें अपने बच्चों को आप का नाम ले कर डराया करती थीं मैं समझता था कि न मालूम महमूद कैसा ज़ालिम और जाबिर होगा यहाँ तक कि आप ने खुद हमारे मुल्क पर हमला किया और इस फ़ौज से मुक़ाबला हुआ जिस में यह गुलाम मौजूद था- उस वक़्त तक मैं आप के नाम से डरा करता था- फिर मैं आप के हाथों कैदी हुआ तो मेरी जान ही निकल गई कि बस अब खैर नहीं मगर हुज़ूर ने दुश्मनों की रवायात के खेलाफ मेरे साथ वह बर्ताओ फरमाया कि आज मेरे सर पर ताज ए सल्तनत रखा जा रहा है तो इस वक़्त मुझे यह खियाल कर के रोना आ गया कि काश आज मेरी माँ होती तो मैं उस से कहता कि देख यह वही महमूद है जिस को हव्वा बतलाया करती थी-


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