Wednesday, 11 March 2020

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बर हक़ होने का अग्यार को भी यकीन था

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बर हक़ होने का अग्यार को भी यकीन था


हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बर हक़ होने का अग्यार को भी यकीन था islamic interesting article in hindi
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तारीख़ (इतिहास) मदीना में एक वाकिया लिखा है कि हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की वफात के चंद सदी बाद दो शख्स मदीने में हुज़ूर के (जसद ए अतहर) को निकालने आये थे- मस्जिद नबवी के पास एक मकान किराया पर ले लिया था और दिन भर नमाज़ व तस्बीह में मशगूल रहते थे- लोग उन के मुक़तदी भी हो गये थे- वह कम्बख्त रात के वक़्त इस मकान से क़बर शरीफ की तरफ सुरंग खोदते थे- और जिस क़दर सुरंग खोद लेते, रातों रात मिट्टी मदीना से बाहर फ़ेंक आते थे- जगह बराबर कर देते ताकि किसी को पता न चले- कई हफ्ता तक वह लोग सुरंग खोदने में मशगूल रहे जब इधर इन लोगों ने यह काम शुरू किया हक़ तआला ने उस ज़माने के सुलतान (बादशाह) को ख्वाब के ज़रिया मुतनब्बे (खबर) कर दिया ख्वाब में हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा कि आप (सअल) के चेहरे मुबारक पर जुज़्न व गम के आसार हैं और आप (स अ ल) इस बादशाह का नाम लेकर फरमा रहे हैं कि मुझे इन दो शख्सों बहुत ईज़ा (तकलीफ़) दे रखी है- जल्द मुझे इन से निजात दो- ख्वाब में दोनों शख्सों की सूरत भी बादशाह को दिखला दी गई- ख्वाब से बेदार हो कर बादशाह ने वज़ीर से इस का तज़किरा (ज़िक्र) किया वज़ीर ने कहा कि मालूम होता है कि मदीने में कोई हादसा पेश आ गया है- आप जल्द मदीना तशरीफ़ ले जाएं- बादशाह ने तुरंत फ़ौज साथ ले कर बहुत तेज़ी के साथ मदीन की तरफ सफर किया और बहुत जल्द मदीने पहुँच गया- इतने दिन में वह लोग बहुत सुरंग खोद चुके थे और बिल्कुल (जसद ए अतहर) के क़रीब पहुँच गए थे- एक दिन देर हो जाती तो वह लोग अपना काम पूरा कर लेते-
बादशाह ने मदीने पहुँच कर तमाम लोगों को मदीने से बाहर दावत की और सब को मदीने के एक ख्वास दरवाज़े से निकलने का हुक्म किया और खुद दरवाज़ा पर खड़े हो कर हर शख्स को खूब गौर से देखता जाता था- यहां तक कि मदीने के सब मर्द शहर से बाहर निकल गए मगर उन दो शख्सों की सूरत पर नज़र न पड़ी जिन को ख्वाब में देखा था- इस लिए बादशाह को सख्त हैरत हुई और लोगों से कहा कि क्या सब लोग बाहर आ गए हैं- लोगों ने कहा कि अब कोई अंदर नहीं रहा बादशाह ने कहा यह हरगिज़ नहीं हो सकता- ज़रूर कोई अंदर रहा है लोगों ने कहा कि दो ज़ाहिद (परहेज़गार) अंदर रह गए हैं वह किसी की दावत में जाया नहीं करते और न किसी से मिलते हैं- बादशाह ने कहा मुझे उन ही से काम है- चुनाँचि जब वह पकड़ कर लाये गए तो यक़ीनन वह दो सूरतें नज़र पड़ीं जो ख्वाब में दिखलाई गई थीं- उन को तुरंत क़ैद कर लिया गया और पूछा गया कि तुम ने हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को किया तक्लीफ़ दी है- चुनाँचि बड़ी देर के बाद उन्हों ने इक़रार किया- कि हम ने (जसद ए अतहर) निकालने के लिए सुरंग खोदी है - चुनाँचि खुद बादशाह ने वह सुरंग देखी तो मालूम हुआ कि क़दम ए मुबारक तक पहुँच चुकी है- बादशाह ने क़दम ए मुबारक को बोसा दे कर (चूम) कर सुरंग बंद करवा दी और ज़मीन को पानी की तह तक खुदवा कर क़ब्र ए मुबारक के चारों तरफ सीसा पिला दिया ताकि आइंदा कोई सुरंग न लगा सके-
(फायदा) इस वाकिया से मालूम हुआ कि मुखालिफीन ( न मानने वाले) को भी जसद ए अतहर के सहीह व सालिम होने का ऐसा पक्का यकीन है की कई सौ वर्ष बाद भी उस को निकालने की कोशिश की अगर इन को ............ महफूज़ होने का यकीन न होता तो वह सुरंग क्यों लगाते- महज़ शक पर इतना बड़ा खतरा का काम कोई नहीं करता- वह लोग अहल ए किताब हैं वह भी खूब समझते हैं कि नबी के जिस्म को ज़मीन नहीं खा सकती- वह खूब जानते हैं कि हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबी बर हक़ थे वह अलग बात है कि जानने के बावजूद नहीं मानते

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