Thursday, 16 May 2019

सेहरी खाने और इफ़तार करने की ज़रूरी बातें

सेहरी खाने और इफ़तार करने का बयान

मसअलह 1
सेहरी खाना सुन्नत है अगर भूक न हो और खाना न खाए तो कम से कम दो तीन छोहारे ही खाले - या कोई और चीज़ थोड़ी बहुत खाले कुछ न सही तो थोड़ा सा पानी ही पी लेवे-
मसअलह 2
अगर किसी ने सेहरी न खाई और उठ कर एक आध पान खा लिया तो भी सेहरी खाने का सवाब मिल गया -
मसअलह 3
सेहरी में जहाँ तक हो सके देर कर के खाना बेहतर है लेकिन इतनी देर न करे कि सुबह होने लगे और रोज़ा में शुबह (शक) पड़ जाए -
मसअलह 4
अगर सेहरी बड़ी जल्दी खाली मगर इसके बाद पान तम्बाकू चाय पानी देर तक खाता पीता रहा जब सुबह होने थोड़ी देर रह गई तब कुल्ली कर डाला तब भी देर करके खाने का सवाब मिल गया और इस का हुक्म भी वही है जो देर करके खाने का हुक्म है-
मसअलह 5
अगर रात को सेहरी खाने के लिए आँख न खुली सब के सब सो गए तो बेसेहरी खाए सुबह का रोज़ा रखो सेहरी छूट जाने से रोज़ा छोड़ देना बड़ी कम हिम्मती की बात और बड़ा गुनाह है-
मसअलह 6
किसी आँख देर में खुली और यह ख्याल हुआ कि अभी रात बाक़ी है इस गुमान पर सेहरी खाली फिर मालूम हुआ कि सुबह हो जाने के बाद सेहरी खाई खी तो रोज़ा नहीं हुआ कज़ा रखे और कफ़्फ़ारह वाजिब नहीं लेकिन फिर भी कुछ खाए पिये नहीं रोज़ादारों की तरह रहे - इसी तरह सूरज डूबने के गुमान से रोज़ा खोल लिया फिर मालूम हुआ कि सूरज नहीं डूबा तो रोज़ा जाता रहा इस की कज़ा करे कफ़्फ़ारह वाजिब नहीं जब तक सूरज न डूब जाए कुछ खाना पीना दुरुस्त नहीं-
मसअलह 7
अगर इतनी देर हो गई कि सुबह हो जाने का शुबह (शक) पड़ गया तो अब कुछ खाना मकरूह है और अगर ऐसे वक्त कुछ खा लिया या पानी पी लिया तो बुरा किया और गुनाह हुआ- फिर अगर मालूम हो गया कि इस वक्त सुबह हो गई थी तो इस रोज़ा की कज़ा रखे और अगर कुछ मालूम न हो शक ही शक रह जावे तो कज़ा रखना वाजिब नहीं है लेकिन एहतियात की बात यह है कि इस की कज़ा रख लेवे
मसअलह 8
मुस्तहब यह है कि जब सूरज यक़ीन के तौर पर डूब जाए तो फ़ौरन रोज़ा खोल डाले देर कर के रोज़ा खोलना मकरूह है-
मसअलह 9
बदली के दिन जरा देर कर के रोज़ा खोलो जब खूब यकीन हो जाए कि सूरज डूब गया होगा तब इफ़तार करो और सिर्फ़ घड़ी वगैरह पर एतमाद (यकीन) न करो जब तक के तुम्हारा दिल गवाही न देदे क्यों कि घड़ी कुछ गलत हो गई हो बल्कि अगर कोई अज़ान भी कह देवे लेकिन अभी वक्त आने में कुछ शुबह (शक) है तब भी रोज़ा खोलना दुरुस्त नहीं-

मसअलह 10
छोहारे से रोज़ा खेलना बेहतर है या और कोई मीठी चीज़ हो उस से खोले वह भी न हो तो पानी से इफ़तार करे कुछ औरतें और कुछ मर्द नमक की कंकरी से इफ़तार करते हैं और इस में सवाब समझते हैं यह गलत अक़ीदह है-
मसअलह 11
जब तक सूरज डूबने में शक रहे तब तक इफ़तार करना जायज़ नहीं-

नोट = मसअलह 9 में जो बताया गया है जहाँ सुविधा मुहैया नहीं है उस के लिए है मसअलह 9

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शुक्रिया 

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