Breaking

Wednesday, 22 May 2019

कज़ा रोज़े का बयान

कज़ा रोज़े का बयान

कज़ा रोज़े का बयान, qaza roze ka bayan,
qaza roze ka bayan

मसअलह 1
जो रोज़े किसी वजह से जाते रहे यानी कज़ा हो गए हों. रमज़ान के बाद जहाँ तक जल्दी हो सके उनकी कज़ा रख ले देर न करे बेवजह कज़ा रखने में देर लगाना गुनाह है-
मसअलह 2
रोज़े की कज़ा में दिन तारीख़ मोकर्रर कर के कज़ा की नियत करना कि फ़लाँ तारीख के रोज़े की कज़ा रखता हूँ यह ज़रूरी नहीं है बल्कि जितने रोज़े कज़ा हों उतने ही रोज़े रख लेना चाहिए- अलबत्ता अगर दो रमज़ान के कुछ कुछ रोज़े कज़ा हो गए इस लिए दोनों साल के रोज़ों की कज़ा रखना है तो साल का मोकर्रर करना ज़रूरी है यानी इस तरह नियत करे कि फ़लाँ साल के रोज़ों की कज़ा रखता हूँ-
मसअलह 3
कज़ा रोज़े में रात से नियत करना ज़रूरी है अगर सुबह हो जाने के बाद नियत की तो कज़ा सही नहीं हुई बल्कि वह रोज़ा नफ़ल हो गया कज़ा रोज़ा फिर से रखे-
मसअलह 4
कफ़्फ़ारे के रोज़े का भी यही हुक्म है कि रात से नियत करना चाहिए अगर सुबह होने के बाद नियत की तो कफ़्फ़ारह का रोज़ा सही नहीं हुआ-
मसअलह 5
जितने रोज़े कज़ा हो गए हैं चाहे सब को एक दम से रख लेवे चाहे थोड़े थोड़े कर के रखे दोनों बातें दुरुस्त हैं-
मसअलह 6
अगर रमज़ान के रोज़े अभी कज़ा नहीं रखे और दूसरा रमज़ान आ गया तो ख़ैर अब रमज़ान के अदा रोज़े रखे और ईद के बाद कज़ा रखे लेकिन इतनी देर करना बुरी बात है-
मसअलह 7
रमज़ान के महीने में दिन को बेहोश हो गया और एक दिन से ज़्यादा बेहोश रहा तो बेहोश होने के दिन के अलावा जितने दिन बेहोश रहा उतने दिनों की कज़ा रखे- जिस दिन बेहोश हुआ उस एक दिन की कज़ा वाजिब नहीं है क्योंकि उस दिन का रोज़ा ब वजह (कोई वजह नहीं) नियत के दुरुस्त हो गया- हाँ अगर उस दिन रोज़ा से न था या उस दिन ह़लक में कोई दवा डाली गई और वह ह़लक से उतर गई तो उस दिन की कज़ा भी वाजिब है-
मसअलह 8
और अगर रात को बेहोश हुआ हो तब भी जिस रात को बेहोश हुआ उस एक दिन की कज़ा वाजिब नहीं है बाक़ी और जितने दिन बेहोश रहा सब की कज़ा वाजिब है हाँ अगर उस रात को सुबह का रोज़ा रखने की नियत न थी या सुबह को कोई दवा ह़लक में डाली गई तो उस दिन का रोज़ा भी कज़ा रखे-
मसअलह 9
अगर सारे रमज़ान भर बेहोश रहे तब भी कज़ा रखना चाहिए यह न समझे कि सब रोज़े माफ हो गए- अलबत्ता अगर जुनून (पागल) हो गया और पूरे रमज़ान भर सड़न दिवाना रहा तो इस रमज़ान के किसी रोज़े की कज़ा वाजिब नहीं और अगर रमज़ान शरीफ के महीने में किसी दिन जुनून (पागल पन) जाता रहा और अकल ठिकाने हो गया तो अब से रोज़े रखने शुरू करे और जितने रोज़े जुनून में गए उन की कज़ा भी रखे-

नोट = कफ़्फ़ारह का मतलब है कि रमज़ान शरीफ के रोज़े जान बूझ कर तोड़ डालने पर लगातार दो महीने रोज़े रखे थोड़े थोड़े कर के रोज़े रखने से दुरुस्त नहीं या साठ 60 फ़कीर को खाना खिलाए
दूसरा कफ़्फ़ारह क़सम खाने का है अगर किसी ने क़सम तोड़ दिया यानी क़सम को पूरा न किया तो उस के लिए कफ़्फ़ारह है दस मुहताजों (फ़कीर) को दो वक्त खाना खिला दे
कफ़्फ़ारह के बारे में इंशाअल्लाह फिर कभी दूसरे पोस्ट में पूरे तफ़सील (विवरण) से बताऊँगा

मेहरबानी कर के हमारे इस पोस्ट को शेयर करें अपने facebook whatsApp गुरुप में और किनारे में लाल रंग का घंटी वाला बटन दबा कर Allow करें और हर Update की नॉटिफिकेशन पाएं, शुक्रिया 

No comments:

Post a Comment