Breaking

Tuesday, 14 May 2019

रमज़ान शरीफ के रोज़े के बारे में ज़रूरी बातें

रमज़ान शरीफ के रोज़े का बयान


मसअलह 1
रमज़ान शरीफ के रोज़े की अगर रात से नियत करले तो भी फ़र्ज अदा हो जाता है और अगर रात को रखने का इरादा न था बल्कि सुबह हो गई तब भी यही ख्याल रहा कि मैं आज का रोज़ा न रखूँगा फिर दिन चढ़े ख्याल आ गया कि फर्ज़ रोज़ा छोड़ देना बुरी बात है इस लिए अब रोजा की नियत कर लिया तब भी रोजा हो गया लेकिन अगर सुबह को कुछ खा पी चुका हो तो अब नियत नहीं कर सकता-

मसअलह 2
अगर कुछ खाया पिया न हो तो दिन को ठीक दोपहर से एक घंटा पहले रमज़ान के रोज़े की नियत कर लेना दुरुस्त है-
मसअलह 3
रमज़ान शरीफ के रोज़े में बस इतनी नियत कर लेना काफी है कि आज मेरा रोज़ा है या रात को इतना सोचले कि कल मेरा रोज़ा है बस इतनी ही नियत से भी रमज़ान का रोज़ा अदा हो जाएगा अगर नियत में खास यह बात न आई हो कि रमज़ान का रोज़ा है या फर्ज़ रोज़ा है तब भी रोजा हो जाएगा-
मसअलह 4
रमज़ान के महीने में अगर किसी ने यह नियत की कि मैं नफ़ल का रोज़ा रखूँगा रमज़ान का रोजा न रखूँगा बल्कि इस रोजा़ की फिर कभी कज़ा रख लूँगा तब भी रमज़ान ही का रोज़ा हुवा और नफ़ल का न हुवा-
मसअलह 5
पिछले रमज़ान का रोज़ा कज़ा हो गया था और पूरा साल गुज़र गया अब तक इसकी कज़ा नहीं रखा फिर जब रमज़ान का महीना आ गया तो इसी कज़ा की नियत से रोज़ा रखा तब भी रमज़ान ही का रोज़ा होगा और कज़ा का रोज़ा न होगा कज़ा का रोज़ा रमज़ान के बाद रखे
मसअलह 6
किसी ने नज़्र (भेंट) मानी थी की अगर मेरा फलाँ काम हो जाएगा तो मैं अल्लाह के लिए दो रोज़े या एक रोज़ा रखूँगा फिर जब रमज़ान का महीना आया तो उसने उसी नज़्र (भेंट) के रोज़े रखने की नियत किया रमज़ान के रोज़े की नियत नहीं किया तब भी रमज़ान ही का रोज़ा हुवा नज़्र (भेंट) का रोज़ा अदा नहीं हुवा नज़्र के रोज़े रमज़ान के बाद फिर रखे सब का खुलासा (सारांश Abstract) यह हुआ कि रमज़ान के महीने में जब किसी रोज़े नियत करेगा तो रमज़ान का ही रोज़ा होगा और कोई रोज़ा सही न होगा-
मसअलह 7 
शाबान (रमज़ान शुरू होने से पहले के महीने) की उनतीसवीं तारीख को अगर रमज़ान शरीफ के चाँद निकल आए तो सुबह को रोज़ा रखो और अगर न निकले या आसमान पर अब्र (बादल) हो और चाँद न दिखाई दे तो सुबह को जब तक यह शुबह (शक) रहे कि रमज़ान शुरू हुवा या नहीं रोज़ा न रखो, बल्कि शाबान के तीस दिन पूरे कर के रमज़ान के रोज़े शुरू करो-

मसअलह 8
उनतीसवीं तारीख को अब्र (बादल) की वजह से रमज़ान शरीफ का चाँद नहीं दिखाई दिया तो सुबह को नफ़ल रोज़ा भी न रखो हाँ अगर ऐसा इत्तिफ़ाक़ पड़ा कि हमेशा सोमवार और जुमेरात या किसी और मुक़र्र (निश्चित) दिन का रोज़ा रखा करता था और कल वही दिन है तो नफ़ल की नियत से सुबह को रोज़ा रख लेना बेहतर है फिर अगर कहीं से चाँद की खबर आ गई तो उसी नफ़ल रोज़े से रमज़ान का फ़र्ज़ अदा हो गया अब उसकी कज़ा न रखे-
मसअलह 9
बदली की वजह से उनतीसवीं तारीख को रमज़ान का चाँद नहीं दिखाई दिया तो दोपहर से एक घंटा पहले तक कुछ न खाओ पियो अगर कहीं से खबर आ जाए तो अब रोज़ा की नियत करलो और खबर न आए तो खाओ पियो-

मसअल 10
उनतीसवीं तारीख को चाँद नहीं हुवा तो ख्याल न करो कि कल का दिन रमज़ान का तो है नहीं लाओ मेरे ज़िम्मा जो पार साल का एक रोज़ा कज़ा है उसकी कज़ा ही रखलूँ- या कोई नज़्र मानी थी कि उसका रोज़ा रखलूँ ; उस दिन कज़ा का रोज़ा और कफ्फारा (प्रायश्चित) का रोज़ा और नज़्र का. रखना भी मकरूह है, कोई रोज़ा न रखना चाहिए अगर कज़ा या नज़्र का रोज़ा रख लिया फिर कहीं से चाँद की खबर आ गई तो भी रमज़ान ही का रोज़ा अदा हो गया कज़ा और नज़्र का रोज़ा फिर से रखे और अगर खबर नहीं आई तो जिस रोज़ा की नियत किया था वही अदा हो गया-

नोट = मसअलह के मतलब पिछले पोस्ट में बता दिया गया है अगर मालूम नहीं तो बता देते हैं मसअलह को अंग्रेजी में issue हिन्दी में समस्या कहते हैं

मेहरबानी कर के इस पोस्ट को दोस्तों रिश्तेदारों में share करें शुक्रिया 

No comments:

Post a Comment