Friday, 10 May 2019

रोजे़ के बारे में ज़रूरी बातें

रोजे़ का बयान


मसअलह 1

रमज़ान शरीफ के रोज़े हर मुसलमान पर जो मजनून (पागल) और नाबालिग़ न हो फ़र्ज हैं जब तक कोई उज्र (बहाना)  न हो रोजा छोड़ना दुरुस्त नहीं है - अगर कोई रोजा की नज़्र (भेंट)  कर ले तो नज़्र कर लेने से रोजा फर्ज़ हो जाता है - और क़ज़ा और कफ्फारे (प्रायश्चित) के रोज़े भी फ़र्ज हैं और इस के सिवा और सब रोज़े नफ़ल हैं (रखे तो सवाब है और न रखे तो गुनाह नहीं) अलबत्ता ईद और बक़रईद के दिन और बक़रईद से बाद तीन दिन रोज़ा रखना ह़राम है

मसअलह 2

जब फजर की नमाज़ का वक्त आता है उस वक्त से लेकर सूरज डूबने तक रोजे की नियत से सब खाना और पीना छोड़ दे और औरत से हमबिसतिरी (बीवी से सेक्स) भी न हो - शर्अ (इसलाम के कानून) में इस को रोज़ा कहते हैं -

मसअलह 3

ज़बान से नियत करना और कुछ कहना ज़रूरी नहीं है बल्कि जब दिल में यह ध्यान है कि आज मेरा रोज़ा है और दिन भर कुछ खाना न पीना न हमबिसतर हुई तो उसका रोज़ा हो गया- और कोई ज़बान से भी कह दे कि या अल्लाह तेरा रोज़ा रखूँगा या अरबी में यह कह दे कि  بِصوْمِ غَدِِ نَوَیْتُ (बिसौमि ग़दिन नवैतु) तो कुछ हर्ज नहीं यह भी बेहतर है-


मसअलह 4

अगर किसी ने दिन भर न तो कुछ खाया न पिया सुबह से शाम तक भूका पियासा रहा लेकिन दिल में रोज़ा का इरादा न था बल्कि भूक नहीं लगी या किसी और वजह से कुछ खाने पीने की नौबत नहीं आई तो उस का रोजा नहीं हुआ- अगर दिल में रोज़ा का इरादा कर लेता तो रोज़ा हो जाता-

मसअलह 5 

शर्अ (इसलाम के क़ानून) से रोज़ा का वक्त सुबह स़ादिक़ (फजर) के वक्त से शुरू होता है इस लिए जब तक सुबह न हो खाना पीना वगैरह सब जायज़ है - कुछ औरतें पिछले को सेहरी खा कर नियत की दुआ पढ़ कर लेट रहती हैं और यह समझती हैं कि अब नियत कर लेने के बाद कुछ खाना पीना न चाहिए यह ख्याल गलत है - जब तक सुबह न हो बराबर खा पी सकती है चाहे नियत कर चुकी हो या अभी न की हो-
नोट = 5 जगह मसअलह आया है उस को अंग्रेजी में issue हिन्दी में समस्या कहते हैं

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