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Thursday, 25 April 2019

जुमा के दिन का बधाई देना चाहिए या नहीं جمعہ کے دن کا مبارک باد دینا چاہئیے یا نہیں

جمعہ کے دن کا مبارک باد دینا چاہئیے یا نہیں

آج سے ۲۵ سال بعد نئی نسل میں جمعہ کے دن کی مبارک دینا ایک لازمی قسم کا رواج بن چکا ہو گا ۔
اور پھر مزید ۶۰/ ۵۰ سال میں اسے ایک سنت یا فریضے کے طور پر جانا جائے گا۔

जुमा के दिन का बधाई देना चाहिए या नहीं


आज, 25 साल बाद नई पीढ़ी में शुक्रवार को बधाई देना एक अनिवार्य परंपरा बन चुका होगा।
और फिर 60/50 वर्षों में इसे एक सुन्नत या फ़र्ज़ के नाम से जाना जाएगा।
اس وقت جو شخص لوگوں کو بتائے گا کہ : “یومِ جمعہ کی مبارکباد دینا نہ تو سنت ہے نہ فرض ، بلکہ اسے ایسا سمجھنا بدعت ہے، کیونکہ ایسا کرنا قرآن و حدیث اور صحابہ سے ثابت نہیں ہے” ۔۔
उस समय, व्यक्ति यह बताएगा कि: "यह शुक्रवार के दिन को बधाई देने के लिए अनुमति नहीं है और न ही अनिवार्य है, बल्कि ऐसा समझना बिदअत है, क्योंकि ऐसा करना कुरान और हदीस द्वारा सिद्ध नहीं है।"
تو لوگ اس سے کہیں گے : “ تم عجیب بات کر رہے ہو، ہم نے تو اپنے باپ دادا کو ایساہی کرتے دیکھا ہے اور ان کے علماء بھی ان کو منع نہیں کرتے تھے تو تم ان علماء سے زیادہ علم رکھتے ہو؟ ہم نہیں بلکہ تم نئی بات کر رہے ہو!”
وہ شخص اس دور کا وھابی کہلائے گا اور بزرگوں کا گستاخ ٹھہرے گا حالانکہ حق پہ ہو گا!
तो लोग उससे कहेंगे: "तुम अजीब बात कर रहे हो, हमने तो अपने बाप दादा को ऐसा ही करते देखा है और उनके विद्वानों ने भी उन्हें मना नहीं किया है, तो क्या तुम इन विद्वानों से अधिक जानते हैं? हम नए नहीं हैं लेकिन तुम नई बात कर रहे हो! "
व्यक्ति को इस युग का वहाबी कहा जाएगा, और बुज़ुर्गों (बड़ों) का गुस्ताख़ टहरेगा, भले ही वह सही होगा!
ہماری آنکھوں کے سامنے سوشل میڈیا اور واٹسپ کی ایجاد کے بعد پروان چڑھنے والی ایسی ان گنت بدعات اور خود ساختہ خرافات اور موضوعات کی حوصلہ شکنی کیجئے اور اپنے آپ کو اور آئندہ نسل کو بدعات سے بچائیے۔
हमारी आंखों के सामने, सोशल मीडिया और वाट्सएप के आविष्कार के बाद, इस तरह के अविश्वसनीय नवाचारों (बिदआत) और आत्म-कथाओं और विषयों को हतोत्साहित करें और खुद को और अगली पीढ़ी को नवाचारों से बचाएं।
اگر یومِ جمعہ کی مبارک دینا مستحسن کام ہوتا تو رسولِ اکرم صلى الله عليه و سلم ضرور بضرور اس کا حکم دے دیتے اور صحابہ کرام رضی اللہ عنہم اسے ضرور اپناتے کیونکہ وہ دین کی سمجھ اور نیک عمل کی محبت میں یقیناً ہم سے آگے تھے۔
यदि यह शुक्रवार का बधाई देना के लिए अनिवार्य था, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसे निश्चित रूप से आदेश देते और आप के साथी यानी सहाबा केराम इसे ज़रूर अपनाते,क्योंकि वे निश्चित रूप से अच्छे और अच्छे कर्मों के प्यार में हमसे आगे थे

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